अंहकार, चिंता, तनाव और अनीति से मुक्त हो कर किए गए कर्मों से मिली सफलता ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण 

इन्दौर । जीवन में सफलता का महत्व तभी हो सकता है, जब हम उसे पाने के लिए इगो फ्री, फीयर फ्री, टेंशन फ्री और करप्शन फ्री रहें। अहंकार, चिंता, तनाव और अनीति से मुक्त हो कर जो सफलता मिलती है, वहीं सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और टिकाऊ होती है। जब तक हमारा मन अहंकार मुक्त नहीं होगा, तब तक हम किसी भी क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पाएंगे। सफलता के पीछे भले ही पुरूषार्थ हमने किया हो, लेकिन उसका श्रेय तो परमात्मा को ही जाता है। हम अपने कार्यों की सफलता का श्रेय परमात्मा को देने लगेंगे तो इगो भी घुस नहीं पाएगा। आज का मनुष्य चिंताओं को स्वयं बुलावा दे रहा है। बिना वजह की चिंताओं के बजाय इस बात का चिंतन करना चाहिए कि मैं क्या कर सकता हूं। संसार में पुण्य को ज्यादा महत्व दिया जाता है, जबकि अध्यात्म में पुरूषार्थ को। धर्म के क्षेत्र में पुरूषार्थ से ही पुण्य बढ़ेगा। मन हमंे पुण्य से ही मिला है लेकिन अच्छा या बुरा सोचना यह स्वयं पर निर्भर करता है।  
ये प्रेरक विचार हैं राष्ट्र संत, पद्मविभूषण प.पू. आचार्यदेव रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. के, जो उन्होंने आज सुबह सुखलिया जैन श्रीसंघ के तत्वावधान में परिवर्तन प्रवचनमाला के अंतर्गत ‘सफलता के सही मायने‘ विषय पर महती धर्मसभा में व्यक्त किए। प्रारंभ में सुखलिया श्रीसंघ की ओर से विजय जैन, श्रीमती ज्ञान बापना, श्रीमती रेखा गुगलिया एवं आयोजन समिति के धीरूभाई शाह तथा आशीष शाह ने सभी साधु-साध्वी भगवंतों की अगवानी की। आचार्यश्री गत 3 जून से शहर के विभिन्न जैन श्रीसंघों में पहुंच कर जीवन के ज्वलंत विषयों पर अपने प्रवचनों की अमृत वर्षा कर रहे हैं। प्रवचनमाला से जुड़े कल्पक गांधी एवं अनिल रांका ने बताया कि अब तक गुमाश्ता नगर, कालानी नगर, महेश नगर, पीपली बाजार, स्नेहलता गंज, वल्लभ नगर, पाश्र्वनाथ सोसायटी, क्लर्क कालोनी आदि क्षेत्रों में उनकी धर्म सभाएं हो चुकी हैं। 21 जून से विजय नगर, 23 जून से अनुराग नगर, 26 जून से तिलक नगर, 28 जून से जानकी नगर, 1 जुलाई को सिंधी कालोनी एवं 2 जुलाई से कंचनबाग के बाद 6 से 8 जुलाई तक बिचोली हप्सी स्थित प्रकृति कालोनी में भी उनकी धर्म सभाएं होंगी जहां रोजमर्रा जीवन से जुड़े विषयों पर उनके प्रवचन प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक होंगे। अब तक 340 पुस्तकें लिख चुके राष्ट्रसंत आचार्य रत्नसुंदर म.सा. ने देश में यौन शिक्षा लागू करने के विरोध में संसद सहित अनेक मोर्चो पर कानूनी लड़ाई भी लड़ी है और विजयश्री भी प्राप्त की है। शहर में 15 वर्षों बाद उनका चातुर्मास हो रहा है, जो 11 जुलाई को रेसकोर्स रोड स्थित मोहता भवन पर मंगल प्रवेश के साथ प्रारंभ होगा।
आज सुबह सुखलिया में आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि यह विचारणीय प्रश्न है कि हम जीवन में जो कुछ प्राप्त करते हैं, उसमें पुण्य का हिस्सा कितना होता है और पुरूषार्थ का कितना। संसार के क्षेत्र में पुण्य को ज्यादा महत्वपूर्ण और आवश्यक माना जाता है, पुरूषार्थ दूसरे क्रम पर रक्षा गया है लेकिन अध्यात्म क्षत्र में पुरूषार्थ पहले नंबर पर है और पुण्य दूसरे नंबर पर। हालांकि पुरूषार्थ से ही पुण्य बढ़ता है और मन भी पुण्य से ही मिला है किंतु अच्छा या बुरा सोचना यह हम पर ही निर्भर है। सही मायने में जीवन में सफल बनना है तो जब भी सफलता मिले, मन को इगो फ्री बना लें। सफलता से अहंकार चढ़ने लगता है। निश्चित ही सफलता के पीछे पुरूषार्थ तो हमारा ही होगा लेकिन इसका श्रेय परमात्मा को देने की प्रवृत्ति बन जाएगी तो कभी अहंकार या इगो नहीं आएगा। अनावश्यक चिंताओं से मुक्त हो कर इस बात का चिंतन करें कि हम क्या कर सकते हैं। यह भी चिंतन करें कि परमात्मा की कृपा से पुण्य बढ़ेगा या पुरूषार्थ करने की क्षमता, और यह भी कि संसार में पुरूषार्थ करने से पुण्य बढ़ेगा या नहीं। ंिचंतन करने से यदि समस्या का समाधान न भी हो तो भी बेलेंस आॅफ माईंड तो बना ही रहेगा और मन की स्वस्थता कायम रहने के साथ चिंताओं का भय भी कम हो जाएगा। चिंता एक मानसिक अवस्था ही है। जीवन में सफलता के सही मायने यही है कि हम इगो फ्री, फीयर फ्री, टेंशन फ्री और करप्शन फ्री रहें। किसी भी क्षेत्र में गलत काम करने से बच कर रहना ही करप्शन फ्री होना है।    

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