अज्ञान, अहंकार और अंधकार के आवरण को हटाते हैं भगवान  

इन्दौर । आज के संदर्भों में विवाह जैसा संस्कार भी अब प्रदर्शन और कुरीतियों से घिर गया है। कृष्ण और रूक्मणी का विवाह नारी के प्रति मंगल भाव का सूचक है। चीरहरण वह लीला है जिसमें भगवान हमारे अज्ञान, अहंकार और अंधकार के आवरण को हटाते हैं। इस पर्दे को हटाए बिना जीवात्मा और परमात्मा का मिलन संभव नहीं है। भारतीय संस्कृति में विवाह सात जन्मों का संस्कार माना गया है। पाश्चात्य देश विवाह के नाम पर कितने विकृत तरीके अपना रहे है, किसी से छुपा नहीं है।
ये दिव्य विचार हैं भागवताचार्य पं. डॉ. सुखेंद्र दुबे के, जो उन्होंने हवा बंगला स्थित शिर्डी धाम सांई बाबा मंदिर पर चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में कृष्ण-रूक्मणी विवाह प्रसंग की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। विवाह का उत्सव धूमधाम से मनाया गया। कृष्ण और रूक्मणी ने जैसे ही एक-दूसरे को वरमाला पहनाई, समूचा कथा स्थल भगवान के जयघोष से गूंज उठा। समूचा पांडाल भजन गायक सरदार सुरजीतसिंह एवं मुकेश रासगाया की कर्णप्रिय प्रस्तुतियों पर झूमता रहा। कथा शुभारंभ के पहले रोहित चैधरी, कमल जोशी, अनिल तिवारी, साधना तिवारी, विजय दिघे, मनीष एवं मयंक आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। कृष्ण-रूक्मणी की आरती में मंदिर प्रमुख ओमप्रकाश अग्रवाल, कृष्णकांता रासगाया, पीयूषा शुक्ला, प्रणव शुक्ला, किरण, पूनम बहन तथा विष्णु प्रसाद शुक्ला, मनोहर रासगाया आदि ने भाग लिया।
विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या के दौरान आचार्य डॉ. दुबे ने कहा कि कृष्ण शरीर हैं और राधा उनकी आत्मा। कृष्ण नित्य हैं, शाश्वत हैं और दिव्य भी हैं। वे सच्चिदानंद हैं। वृंदावन, राधा, कृष्ण और गोपियां ये सभी एक ही हैं, इन्हें अलग-अलग कर देखना संभव नहीं है। भगवान का माधुर्य और प्रभाव भी शाश्वत है। निराकार कृष्ण का नाम राधा और साकार राधा का नाम ही कृष्ण है। रासलीला निष्काम और निश्छल भक्ति का अनुपम उदाहरण है। पुराणों में कहा गया है कि रास के समय कृष्ण की उम्र 9 वर्ष और गोपियों की 6 वर्ष थी। रासलीला निष्काम साधना का ही हिस्सा है। राधा और कृष्ण के रिश्ते ज्ञानियों के लिए रहस्यपूर्ण है जबकि प्रेमियों के लिए रसपूर्ण।

Leave a Reply