एक भ्रमित सच्चाई है समाज में बेटियों को लेकर सोच का बदलना

नई दिल्‍ली।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 40वें संस्करण में समाज में महिलाओं की उल्लेखनीय भूमिका को दोहराते हुए कहा है कि एक बेटी 10 बेटों के बराबर होती है। नारी शक्ति की स्वीकार्यता के पक्ष में दिए गए इस महत्वपूर्ण बयान से इतर भी हाल के कुछ सर्वेक्षणों पर यकीन करें तो लगता है कि देश में लड़कियों के अच्छे दिन आ गए हैं। जैसे नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) ने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अध्ययन करके यह नतीजा निकाला है कि 79 फीसद महिलाओं और 78 फीसद पुरुषों को संतान के रूप में कम से कम एक बेटी अवश्य चाहिए। बेटी की यह चाहत ग्रामीण इलाके की महिलाओं में अधिक (81 फीसद) है, जबकि शहरी महिलाओं में यह आंकड़ा 75 फीसद है, लेकिन हिंदी पट्टी के इलाकों (यूपी, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार) में बेटों की ख्वाहिश कम नहीं हुई है। इन इलाकों में 37 प्रतिशत महिलाओं को बेटियों की तुलना में अधिक संख्या में बेटे चाहिए। मोटे तौर पर प्रधानमंत्री के बयान और इस सर्वेक्षण का आकलन यह कहता है कि देश में बेटियों की चाहत पिछले कुछ समय में बढ़ी है।

ऐसा लगता है कि पिछले कुछ वर्षो से देश में चलाए जा रहे बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और सेल्फी विद डॉटर्स जैसे अभियानों के बल पर समाज में लड़कियों को लेकर सोच बदली है और अब लोग अपने परिवार में बेटियों का स्वागत करने को तैयार हैं। नि:संदेह शासन-प्रशासन के स्तर पर महिलाओं को आगे लाने और उनके सम्मान-विकास को अहमियत देने के जो प्रयास पिछले कुछ समय में किए गए हैं, उनसे एक सार्थक संदेश देश-दुनिया में गया है और ऐसा प्रतीत होता है कि समाज के स्तर पर बेटियों को लेकर सोच बदली है, पर यह एक भ्रमित करने वाली सच्चाई है। विडंबना यह है कि समाज में अभी भी बेटियों को बोझ माना जा रहा है। अभी भी लड़के-लड़की का भेद जारी है और इस कारण गर्भ से ही बेटियों के साथ उपेक्षा व हिकारत शुरू हो जाती है। ‘सेव द चिल्ड्रेन’ के एक अध्ययन के अनुसार लड़कियों-महिलाओं को स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा में भेदभाव तो झेलना ही पड़ता है, इसके साथ-साथ हर तरह की हिंसा से उनके बचाव की तरफ भी ध्यान नहीं दिया जाता।


लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या कम 


इसी भेदभाव का परिणाम है कि अखिल भारतीय स्तर पर 1991 में जहां जन्मे लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या 42 लाख कम थी, 2001 तक की अवधि में यह अंतर बढ़कर 71 लाख पहुंच गया था। बीते 15-17 वर्षो में आंकड़ों की यह खाई और भी गहरी हो चुकी है। लड़कियों से सामाजिक भेदभाव का एक संकेत बीच में पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या के रूप में मिलता है। बीते दशकों में पढ़ाई बीच में छोड़ने वालों में लड़कों से ज्यादा संख्या लड़कियों की रही। कक्षा पांच तक औसतन साढ़े 24 फीसद लड़कियां पढ़ाई छोड़ रही हैं, जबकि कक्षा आठ तक के दायरे में ऐसी लड़कियों का आंकड़ा 41 फीसद तक पहुंचता रहा है। उपेक्षा का यह आलम स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई के बाद उनके विवाह के बाद भी कायम रहता है, जहां दहेज उत्पीड़न उनके लिए समस्या बनता है।

विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट


लैंगिक असमानता के हालात पर समय-समय पर विश्व आर्थिक मंच की ओर से रिपोर्टे दी जाती हैं। इन रिपोर्टो के मुताबिक स्त्री और पुरुष के बीच स्वास्थ्य, शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी, संसाधन और रोजगार के अवसरों के बंटवारे के आधार पर तैयार की जाने वाली सूची में भारत का स्थान दुनिया के सौ देशों के बाद ही आता है। इससे यह साबित होता है कि आय, साक्षरता दर और जन्म लेने वाले बच्चों के लैंगिक अनुपात के मानदंडों पर हमारा देश स्त्री-पुरुष के बीच काफी ज्यादा भेदभाव बरतता है। देश की कुल कामकाजी आबादी में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का अनुपात 0.36 का है। इसी तरह का अंतर कमाई में भी है। जैसे पिछले कुछ वर्षो में देश में महिलाओं की औसत आमदनी 1980 डॉलर के बराबर रही, जो कि पुरुषों की औसत कमाई 8087 डॉलर के मुकाबले चार गुना कम है।


खाई को पूरी तरह पाटा नहीं जा सकता


विश्व आर्थिक मंच के मुताबिक मोटे तौर पर अभी दुनिया में स्त्री-पुरुष समानता का स्तर 60 फीसद तक है और इस हिसाब से दुनिया में पुरुषों के बराबर आने में महिलाओं को 80 साल और लग सकते हैं। यानी 2095 से पहले स्वास्थ्य, शिक्षा, राजनीति और कार्यस्थलों पर स्त्री-पुरुष के बीच गैरबराबरी की खाई को पूरी तरह पाटा नहीं जा सकता। हालांकि विश्व आर्थिक मंच के अनुसार बीती अवधि में राजनीतिक सशक्तीकरण के मामले में भारत में हालात सुधरे हैं। अब महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ने के पर्याप्त मौके मिल रहे हैं, पर जब तक पुरुषों के मुकाबले श्रम बाजार का उनका अनुभव कम रहेगा और उनकी पढ़ाई-लिखाई का स्तर भी कम ही रहेगा तब तक किसी बड़े सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। लैंगिक भेदभाव का यह मौजूदा असर खत्म हो सकता है, लेकिन इसकी दो अहम शर्ते हैं। पहली, महिलाओं को समुचित शिक्षा मिले और दूसरी, उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़े।


33 फीसद आरक्षण देने की बात


राजनीति में तो इधर स्त्रियों का दखल बढ़ा है और पिछले कई वर्षो से महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण देने की बात भी चल रही है, पर अभी भी जिस तरह से महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में अटका हुआ है उससे यह संदेह होता है कि हमारा समाज वास्तव में महिलाओं को बराबरी पर लाने का इच्छुक नहीं है। हालांकि महिलाओं का राजनीतिक सशक्तीकरण एक अहम मुद्दा है, पर साथ ही जरूरी यह भी है कि लड़कियों की शिक्षा का समुचित प्रबंध हो। इसके साथ ही समाज को अपनी यह मानसिकता बदलनी होगी कि जो स्त्री घर से बाहर काम करने निकली है, उसका उद्देश्य घर और समाज में पुरुषों को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि घर-समाज में बराबरी का योगदान देना है। इसी तरह जो महिला नौकरी करने के बजाय घरेलू कामकाज को कुशलता से निपटाती है तो उसके इस योगदान के आर्थिक महत्व को समझने और श्रेय देने की जरूरत है। ऐसी स्थितियों में ही लैंगिक असमानता की हालत में सुधार आ सकता है और अभी जो स्त्री खुद को हर मोर्चे पर उपेक्षित महसूस कर रही है, उसमें आत्मविश्वास जग सकता है।


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