कच्चे मकान में रहता है बस्तर के पहले सांसद का परिवार

जगदलपुर। पहले राजनीति में साधारण परिवारों के लोग भी बड़ा मुकाम हासिल कर लेते थे। तब के चुनाव आज जैसे महंगे नहीं थे। शायद यही कारण है कि बस्तर को पहला सांसद देने वाला सुकमा जिले का इड़जेपाल गांव आज भी गरीबी और अभाव से जूझ रहा है।
पहले सांसद मुचाकी कोसा का परिवार आज भी कच्चे मकान में रहता है। केशलूर-कोंटा राष्ट्रीय राजमार्ग पर छिंदगढ़ ब्लॉक के ग्राम कुकानार से करीब दस किलोमीटर दूर इड़जेपाल की 95 फीसद आबादी आदिवासी है। इड़जेपाल पंचायत में चार से पांच आश्रित बसाहट क्षेत्र हैं।
यहां की कुल आबादी 14 सौ से अधिक है। पंचायत मुख्यालय इड़जेपाल की आबादी छह सौ के आसपास है। पंचायत के आधे से अधिक परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करते हैं। इड़जेपाल तीन साल पहले तक बस्तर जिले के दरभा ब्लॉक में शामिल था।
तीन साल पहले ही इसे सुकमा जिले में शामिल किया गया है। नईदुनिया ने इड़जेपाल पहुंचकर गांव का जायजा लिया और विकास कार्यों की जानकारी ली। मुचाकी कोसा आजादी के बाद पहले आम चुनाव में 1952 में निर्दलीय चुनाव लड़कर जीते थे जबकि बेट्टी जोगा अस्सी के दशक में विधायक चुने गए थे।
इड़जेपाल की आज भी सबसे बड़ी पहचान किसी और कारण से नहीं बल्कि बस्तर के पहले सांसद के गांव के रूप में ही है। मुचाकी कोसा और बेट्टी जोगा आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके परिजन यहां निवासरत हैं। कच्चे खपरैल और झोपड़ीनुमा मकानों में रहकर भी परिजन काफी खुश हैं।
इन्हें इस बात का गुमान है कि उनके पुरखे कभी सांसद और विधायक रहे हैं, लेकिन इस बात का अफसोस भी है कि इड़जेपाल जहां से किसी जमाने में अविभाजित बस्तर जिले की राजनीति चलती थी, नेताओं और अफसरों का गांव में तांता लगा रहता था, आज कोई झांकने तक नहीं आता। चुनाव के समय नेता वोट मांगने आ जाते हैं और अफसर नक्सल भय का बहाना बनाकर गांव से कन्नी काटे रहते हैं।
बस्तर संभागीय मुख्यालय से करीब सत्तर किलोमीटर दूर इड़जेपाल पहुंचने कुकानार से दस किलोमीटर लंबी जर्जर सड़क है। गांव में स्कूल, आंगनबाड़ी, पंचायत भवन है पर इसके आगे विकास की कहानी खत्म हो जाती है।
कृषि प्रधान इस इलाके में सिंचाई के साधन नहीं होने से एक ही फसल धान ली जाती है। खेती-किसानी और मजदूरी और वनोपज संग्रह इनकी आमदनी का मुख्य स्रोत है। मुचाकी कोसा के प्रपौत्र मुचाकी बुर्रा और बेट्टी जोगा के नाती लक्ष्मण बेट्टी ने बताया कि गांव वाले चाहते हैं कि गांव तक पहुंचने अच्छी पक्की सड़क, पीने का साफ पानी और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हो, पर ये सब नहीं है।
आज पैसा है, पर नीयत नहीं
बुर्रा और लक्ष्मण का कहना है कि उनके पुरखों ने अपने समय में इड़जेपाल के विकास के लिए काम किया। उस समय पैसा नहीं हुआ करता था इसलिए ज्यादा काम कराने की गुंजाइश नहीं थी। पर आज ग्रामीण विकास के लिए भरपूर पैसा है पर विकास को लेकर नीयत नहीं दिखती। गांव वाले चाहते हैं कि बस्तर के पहले सांसद के ग्राम इड़जेपाल को समस्यामुक्त बनाने विकास के काम तेज किए जाएं ताकि यहां के लोग गर्व महसूस कर सकें। रोजगार के अवसर बढ़ाने की भी जरूरत है।
