खुशियां बांटने के लिए पुण्य का उदय नहीं, हृदय के भाव होना चाहिए : आचार्य रत्नसुंदर

इन्दौर । इस संसार में हमें जो भी कुछ मिला है, उसकी सार्थकता तभी साबित होगी जब हम उसे दूसरों के साथ बांटते चलेंगे। समय, विचार, शब्द, संपत्ति, शरीर आदि के माध्यम से हम छोटी-बड़ी खुशियां बांटकर सामने वालों को प्रसन्न कर सकते हैं। अपनी चीजें और खुशियां बांटने के लिए पुण्य का उदय नहीं, हृदय के भाव होना चाहिए। छोटी-छोटी चीजों को बांटकर भी खुशियां बटोरी जा सकती है लेकिन विडंबना यह है कि हमारे पास इतना व्यापक दृष्टिकोण ही नहीं है। मन हमारी सारी गतिविधियों का केंद्र होता है इसलिए मन का निरीक्षण या आकलन लगातार चलते रहना चाहिए। लगातार निरीक्षण से जीवन में बदलाव अवश्य आएगा।
ये प्रेरक विचार हैं राष्ट्र संत, पद्मविभूषण प.पू. आचार्यदेव रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. के, जो उन्होंने आज सुबह सुखलिया जैन श्रीसंघ के तत्वावधान में परिवर्तन प्रवचनमाला के अंतर्गत ‘चलते रहो, रूको मत’ विषय पर महती धर्मसभा में व्यक्त किए। आचार्यश्री ने कहा कि जीवन को निरंतर गतिमान बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम अपने पास उपलब्ध चीजों को दूसरों को बांटते रहें, विफलता के बावजूद अपने प्रयत्न बंद नहीं करें और असफल हो जाने के बाद भी अपने प्रयास जारी रखें, विशेषकर साधना के क्षेत्र में। मन का पर्यवेक्षण या निरीक्षण भी लगातार करते रहना चाहिए तभी जीवन में बदलाव कर पाएंगे। जिसने अपने मन को बिगाड़ लिया है, उसके जीवन में विपत्ति के सिवाय कुछ भी नहीं बचेगा। मन हमारा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है इसलिए ऐसे मन को लगातार निगरानी में बनाए रखें। रात्रि को सोने से पहले दिनभर में हुई सभी गलतियों को माफ करने का अभ्यास भी होना चाहिए। भगवान कहते हैं कि यदि तूने ऐसा कर दिया तो सुबह उठने से पहले तेरी सभी गलतियों को मैं भी माफ कर दूंगा। व्यवहारिक जीवन में कई तरह के रिश्ते बनते-बिगड़ते रहते हैं लेकिन याद रखें कि किसी के भी प्रति स्थायी द्वेष भाव कभी नहीं होना चाहिए। इसी तरह जीवन को चलायमान रखने के लिए अपनी प्रार्थना भी कभी बंद नहीं करना चाहिए क्योंकि हमारी हर प्रार्थना का भगवान किसी न किसी रूप में निश्चित फल देते हैं। इसे हम भगवान की ओर से प्रार्थना का उत्तर भी कह सकते हैं। अंतर यही है कि हम भगवान से अपनी मर्जी के समय पर परिणाम चाहते हैं जबकि भगवान हमारे चाहे गए समय पर नहीं, उनके चाहे गए समय पर फल देते हैं। एक बात और, अच्छा काम करने में मन की सबसे बड़ी चालाकी या बदमाशी यह होती है कि वह ना तो नहीं बोलता है लेकिन उसे शुभ संकल्प को टालता रहता है। जीवन हमें निरंतर गतिशील रहने के लिए ही मिला है। अतः उक्त चारों सूत्रों के मापदंड पर अपने मूल्यवान जीवन को आगे बढ़ाते रहें। प्रारंभ में सुखलिया जैन श्रीसंघ की ओर से रमणिकलाल ओरा, अभय जैन, त्रिलोक कटारिया एवं चातुर्मास आयोजन समिति की ओर से कल्पक गांधी, अनिल रांका एवं जयेश शाह ने आचार्यश्री एवं साधु-साध्वी भगवंतों की अगवानी की। इसके पूर्व सुखलिया पहंुचने पर बैंड-बाजों सहित आचार्यश्री का मंगल प्रवेश जुलूस भी निकाला गया। परिवर्तन प्रवचनमाला से जुड़े कल्पक गांधी ने बताया कि गुरूवार 20 जून को सुबह 9 से 10 बजे तक आचार्यश्री सुखलिया जैन श्रीसंघ के तत्वावधान में ‘सफलता के सही मायने’ विषय पर अपने प्रवचनों की अमृत वर्षा करेंगे। आचार्यश्री 21-22 जून को विजय नगर में प्रवचन करेंगे।
:: आगामी कार्यक्रम ::
आचार्यश्री 23 से 25 जून तक अनुराग नगर, 26-27 जून को तिलक नगर, 28 से 30 जून तक जानकी नगर, 1 जुलाई को सिंधी कालोनी, 2 से 5 जुलाई तक कंचन बाग एवं 6 से 8 जुलाई तक बिचोली हप्सी स्थित प्रकृति कालोनी में विभिन्न विषयों पर अपने प्रवचनों की अमृत वर्षा प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक करेंगें। 11 जुलाई को आचार्यश्री कंचनबाग से मंगल प्रवेश सामैया के साथ रेसकोर्स रोड स्थित मोहता भवन पर चातुर्मासिक अनुष्ठान के लिए आऐंगे। 14 जुलाई को सुबह 9 से दोपहर 3 बजे तक जाल सभागृह में जीवन प्रबंधन एवं जीवन शैली पर 18 से 25 वर्ष आयु के युवा-युवतियों के लिए एक दिवसीय वर्कशॉप भी रखा गया है। इसका विषय होगा ‘एट्टीन प्लस’। इसमें जैन के अलावा अन्य समाजों के युवा भी भाग ले सकेंगे।
