गणतंत्र के मायने
गणतंत्र दिवस सात दशक की यात्रा पूरा कर चुका है। सात दशकों की यात्रा में हमारे गणतंत्र की चमक दिनोंदिन बढ़ती गई है। विश्व में भारत की पहचान आज एक सक्षम और मजबूत जनतांत्रिक देश की है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका ही नहीं, यूरोप के भी कई देश जो अपने यहां लोकतंत्र की जड़ जमाने में जुटे हैं, इसके लिए जरूरी सबक विकसित देशों से ज्यादा भारत से सीखना चाहते हैं। विज्ञान और टेक्नॉलजी के क्षेत्र में भारत काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है, साथ ही विश्व स्तर पर जारी पर्यावरण रक्षा मुहिम में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है। भारत में सोलर एनर्जी का उत्पादन तेजी से बढ़ा है और इस मामले में हम दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर पहुंच गए हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को पिछले कई वर्षों से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। लेन-देन की प्रक्रिया में डिजिटलाइजेशन बढऩा भी एक बड़ी उपलब्धि है। हालांकि, इसका ट्रिगर पॉइंट बनी नोटबंदी के साथ लोगों की बुरी स्मृतियां भी जुड़ी हैं। विकास प्रक्रिया में पीछे छूटने वाले वर्गों पर व्यवस्था का फोकस बढ़ा है। किसान की बेहतरी लिए आज सरकार ही नहीं, विपक्ष भी चिंतित है। महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बढ़ी है। मामले का दूसरा पहलू यह है कि इधर हमारी व्यवस्था में कुछ दरारें उभरती दिखी हैं जो चिंता का विषय है। पहली बार नागरिकता की ऐसी परिभाषा सामने आई है जिसका संवैधानिक मूल्यों के साथ कोई मेल नहीं दिखता। सरकारी नीतियों के विरोध में उठती आवाजों को राजद्रोह बताने का चलन बढ़ा है और अल्पसंख्यक समुदायों में भय का एक तत्व भी दिखाई पड़ रहा है। बहरहाल, भारतीय गणतंत्र की यह खूबी है कि वह अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर कर लेता रहा है और यह सिलसिला आगे भी चलेगा।
अब आधुनिक भारत को ऐसी व्यवस्था की दरकार है जो बिना भेद किए गण को तंत्र के हर निर्णय में भागीदारी का अवसर दें, जन प्रतिनिधि के रूप में यह व्यवस्था तो है किंतु तंत्र को अधिक पारदर्शी होने की आवश्यकता है। यहां यह बात भी नहीं भूली जानी चाहिए कि गण और तंत्र एक दूसरे के पूरक है । गण अपने कर्तव्य को पूरा करें और तंत्र अपनी नीतियों से गण को उसके अधिकार दें और कर्तव्य पूर्ति के सरल नियम बनाए। आधुनिक भारत का निर्माण दोनों की ही सजग भागीदारी से संभव है। अब यह नहीं हो सकता कि एक तरफ आप अमेरिका के ट्रैफिक नियमों की तारीफ करें और खुद नियमों का पालन ना करें। विदेशों की जगमगाती सड़कों को देख आहें भरें और पिच्च से अपनी सड़कों पर थूक दे। भ्रष्टाचार की आलोचना करें और खुद भ्रष्टाचारी बने रहें, सोचिए राष्ट्र कोई जीवंत इकाई नहीं है उसे जीवंत इकाई आप बनाते हैं। एक भूमि के टुकड़े का परिचय वहां निवास करने वाले मनुष्यों से होता है वैसे बने जैसा देश आप चाहते हैं, पर उपदेश कुशल बहुतेरे, की तर्ज पर दूसरों में बदलाव किसी भी तरह की उन्नति और प्रगति की गति धीमी कर देता है।
अतएव वर्तमान में आवश्यकता इस बात की है कि उक्त तीनों पीढिय़ों को कैसे एक जाजम पर बैठाया जाए, ताकि भारतीय राष्ट्रीयता के तारतम्य में उक्त पीढिय़ों के बीच पारस्परिक संवाद पैदा हो सके। भारतीय राष्ट्रीयता की अस्मिता का भान कराने वाला एक बड़ा कारक हमारी स्वतंत्रता का तो है ही इसके उपरांत सदियों पुरानी हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति, परदु:खकातरता से लिप्त हमारी संवेदनाएं, युद्धों को टालने वाली और मानव मात्र के संदर्भ में हमारी अहिंसक विचारधाराएं, अतीत में प्रकाशित हमारे संधि प्रस्तावों के अभिलेख इत्यादि भी भारतीय राष्ट्रीयता की अस्मिता को मुस्तैदी देने वाले बड़े कारक हैं।
