गांधी जयंती पर विशेष – गांधी जी की दृष्टि में भारतीय लोकतंत्र

इस वर्ष 2 अक्टूबर से महात्मा गांधी की के जन्म का एक सौ पचास वां वर्ष प्रारंभ होगा इस वर्ष के दौरान अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे। इस अवसर पर उनके रचनात्मक कार्यक्रम तथा अंतिम बसीयत की चर्चा सामयिक होगी।
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता मिलने के बाद राजसत्ता के लिए जो नीतिगत सुझाव दिये, उनको अनेक विचारक तथा विश्लेषक गांधी जी की वसीयत का नाम देते हैं। भारत में जो शासनतंत्र है, उसे संसदीय लोकतंत्र कहा जाता है। यह संसदीय लोकतंत्र, लोकशाही या पार्लियामेन्टरी डेमोक्रेसी अनेक देशों में प्रभावी है। भारत की वर्तमान संवैधानिक शासन व्यवस्था इंग्लैण्ड, अमेरिका आदि कुछ लोकतांत्रिक देशों में प्रचलित चुनाव व्यवस्था, शासन प्रणाली तथा कार्यपालिका एवं विधायिका की कार्य पद्धति के आधारों पर बनाई गई है लेकिन महात्मा गाँधी की इस संबंध में स्वतंत्र तथा मौलिक अवधारणा थी। राज्य की अपनी अवधारणा के आधार पर गांधी जी ने भारत के स्वराज की एक रुपरेखा दी थी।
महात्मा गाँधी ने भारत के स्वाधीनता संघर्ष में जिस गरिमामय भूमिका का निर्वाह किया, वह सर्वविदित है। उनके नेतृत्व में चला अहिंसक आंदोलन पूरी दुनिया के लिये मिसाल बन चुका है। लेकिन, उनका चिन्तन-मनन भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य की प्राप्ति के तौर तरीकों तक सीमित नहीं था। आजादी मिलने के बाद भारत में सरकार की रीति-नीति तथा लोगों का आचार-विचार, व्यवहार कैसा हो, इसके संबंध में उन्होंने अपने विचार बहुत स्पष्ट रखे थे।
स्वाधीन भारत में शासन के स्वरूप, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के आचरण और नागरिक दृष्टिकोण के संबंध में महात्मा गाँधी के विचार विश्व के अनेक दार्शनिकों तथा नीति-निर्देशकों से मिलते है। प्रसिद्ध दार्शनिक गेटे का यह मत था कि सबसे अच्छा शासन वही है जो आत्मशासन की शिक्षा दे। प्रख्यात पश्चिमी समाजशास्त्री थोरो ने भी कहा था कि जो सबसे कम शासन करे, वही सबसे उत्तम सरकार है। महात्मा गाँधी के विचार भी इन विख्यात दर्शनशास्त्रियों से मिलते थे। वे भी व्यक्ति के आत्म-शासन और राज्य सत्ता के न्यूनतम शासन के पक्ष में थे।
गाँधी जी का यह मानना था कि ”मेरी दृष्टि में राजनीतिक सत्ता अपने आप में साध्य नहीं है। यह जीवन के प्रत्येक विभाग में लोगों के लिये अपनी हालत सुधार सकने का एक साधन है।“ उन्होंने स्वराज्य की रूपरेखा कुछ यों दी थी -”मेरे सपनों का स्वराज्य तो गरीबों का स्वराज्य होगा। जीवन की जिन आवश्यकताओं का उपयोग राजा और अमीर लोग करते है, वह उन्हें भी सुलभ होनी चाहिये। उसमें फर्क के लिये स्थान नहीं हो सकता।“
राज्य के कर्तव्यों के साथ ही गांधी जी ने नागरिकों के कर्तव्यों पर भी उतना ही जोर दिया था। उन्होंने अपने लेखों में सदैव कर्तव्य पालन की भावना को महत्व दिया। उनका मत था कि अधिकारों का सच्चा स्रोत कर्तव्य है। अगर हम सब अपने कर्तव्यों का पालन करें तो अधिकारों को खोजने बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा।
भारत की आजादी के बाद ’हिन्द स्वराज्य‘ शीर्षक एक आलेख में गांधीजी ने अपना यह विचार व्यक्त किया है कि स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत की शासन व्यवस्था, नागरिक के कर्तव्य, अधिकार तथा उत्तरदायित्व तथा राष्ट्र के विकास का क्या स्वरूप होना चाहिए। समय-समय पर अपने लेखों तथा भाषणों में भी उन्होंने इस पर प्रकाश डाला तथा कांग्रेस के नेताओं और देश की जनता को मार्गदर्शन दिया। गांधीजी के हिन्द स्वराज संबंधी अवधारणा की उनके शिष्य संत विनोबा भावे ने ”शोषण रहित, शासनमुक्त अहिंसक समाज“ के नाम से व्याख्या की।
गांधी जी के हिन्द स्वराज्य का एक महत्वपूर्ण बिन्दु था- सरकार के नियंत्रण से स्वतंत्र रहने का सतत्् प्रयत्न।“ यह स्पष्ट करना उचित होगा कि गांधीजी अराजकतावादी नहीं थे लेकिन उनका यह मत था कि जीवन की हर व्यवस्था और नियमन के लिए सरकार की ओर हमें नहीं ताकना चाहिए। प्रख्यात पश्चिमी चिंतक थोरों ने एक बार कहा था कि ”जो सबसे कम शासन करें वहीं सबसे उत्तम सरकार है।“ महात्मा गांधी की राजसत्ता के व्यवहार संबध्ंााh विचारधारा थोरों के मत से मिलती जुलती है। महात्मा गांधी भी थोरो का मत मानते थे।
गाँधी जी की दृष्टि में सरकार चाहे वह विदेशी या राष्ट्रीय, उसका नियंत्रण तथा नियमन व्यक्ति के जीवन पर न्यूनतम होना चाहिए। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि भारत का वर्तमान परिवेश तथा राज्य व्यवस्था गांधी जी के दर्शन से मेल नहीं खाती । एक ओर जहाँ वे न्यूनतम शासकीय नियंत्रण के पक्ष में थे दूसरी ओर हमारे व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन, शिक्षा प्रणाली तथा चिन्तन में शासन का हस्तक्षेप तथा जनता की शासन पर निर्भरता की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह गांधी जी के सपनों का भारत या उनके हिन्द स्वराज्य का अनुपालन नहीं है।
स्वराज्य के संबंध में गांधी जी का निम्नलिखित विचार अत्यंत महत्वपूर्ण तथा मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए – ”मैं अधिक से अधिक लोगों के अधिक से अधिक हित वाले सिद्धांत को नहीं मानता । उसे नग्न रूप में देखें तो उसका यह अर्थ होता है कि 51 फीसदी लोगों के माने गये हित के खातिर 49 फीसदी लोगों के हित का बलिदान कर दिया जाए। यह सिद्वांत निर्दय है तथा मानव समाज की इससे बड़ी हानि हुई है। सब लोगों का अधिक से अधिक हित करना ही एक सच्चा गौरवपूर्ण तथा मानवोचित सिद्धांत है। और यह सिद्वांत तभी अमल में आ सकता है जब मनुष्य अपना स्वार्थ पूरी तरह से छोड़ने को तैयार हो जाए।“
गांधी जी का यह विचार लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का आधार होना चाहिए। वे हर व्यक्ति की आंख का आंसू पोंछने की नीति में विश्वास करते थे। हमने आजादी के बाद जिस लोकतंत्र को अपनाया वह बहुमत के सिद्वांत पर चलता है। गांधी जी की नजर में लोकशाही वह होगी जो सबके कल्याण की चिंता करें। वास्तव में गांधी जी एक राजनेता नहीं थे और वोटों की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे। कांगेस संगठन से वे यदि जुड़े रहे तो शायद इसलिए कि भारत की आजादी का आंदोलन चलने के लिए वे इसे अच्छा माध्यम समझते थे। लेकिन ग्राम स्वराज्य, बुनियादी तालीम, मद्य निशेध, गौ सेवा, हिन्दी का उपयोग, गीता तथा रामचरित मानस का भारत के लोक जीवन में सांस्कृतिक महत्व जैसे मुद्दों पर उनका अभिमत कई नेताओं की राजनीति के अनुकूल नहीं था। भारत को आजादी मिलने के बाद गांधी जी के नीति निर्देशक बिंदुओं की उपेक्षा भी हुई । लेकिन किसी व्यक्ति या सरकार द्वारा महत्व नहीं दिये जाने से गांधी दर्शन की प्रासंगिकता तथा उपयोगिता समाप्त नहीं होती।
सरकार कैसी हो, इसके संबंध में गांधी जी की अवधारणा इन शब्दों से प्रतिध्वनित होती है- ”राजनीतिक सत्ता का अर्थ है राष्ट्रीय प्रतिनिधियों द्वारा राष्ट्रीय जीवन का नियमन करने की शक्ति। अगर राष्ट्रीय जीवन इतना पूर्ण हो जाता है कि वह स्वयं अपना नियमन कर ले तो फिर किसी प्रतिनिधित्व की आवश्यकता नहीं रह जाती। उस समय ज्ञानपूर्ण अराजकता की स्थिति हो जाती है। ऐसी स्थिति में हरेक अपना राजा होता है। वह ऐसे ढंग से अपने पर शासन करता है कि अपने पड़ोसियों के लिये कभी बाधक नहीं बनता । इसलिये आदर्ष व्यवस्था में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होती। परंतु जीवन में आदर्ष की पूरी सिद्वि कभी नहीं होतीं इसलिये थोरों ने कहा है कि जो सबसे कम शासन करे, वही उत्तम सरकार है।“ यह कहना गलत नहीं होगा कि महात्मा गांधी भी थोरो के इस मत के सर्मथक थे।
महात्मा गांधी का राजनीतिक सत्ता के संबध्ंा में जो दृष्टिकोण था, वह लोकतांत्रिक सरकारों के उस स्वरूप तथा कार्यषैली से भिन्न है जो हम इन दिनों भारत में तथा विष्व के लोकतांत्रिक देषों में देख रहे है। भारतीय लोकतत्रं की वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक दलों का एकमात्र लक्ष्य राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति है। गांधी जी इस दृष्टिकोण के विपरीत थें। वे लोकतंत्र के विरोधी नहीं थे लेकिन उनका मुख्य उदृदेष्य व्यक्ति का उत्थान था। इस कारण उनका यह मानना था कि ”बहुमत के नियम का एक हद तक ही उपयोग हे। अर्थात मनुष्य को तफसील की बातों में ही बहुमत के सामने झुकना चाहिए लेकिन बहुमत के चाहे जैसे निर्णयों के लिए अपने को अनुकूल बनाने का अर्थ गुलामी होगा। लोकतंत्र के मानी ऐसा राज्य नहीं जिसमें लोग भेड़ों की तरह व्यवहार करें। लोकतंत्र में व्यक्ति के मत और कार्य की स्वतंत्रता की सावधानी से रक्षा की जाती है।“
गांधी जी ने हिन्द स्वराज्य‘ की व्याख्या करते हुए अपने सपनों के भारत का रूप स्पष्ट किया था लेकिन स्वतंत्रता के बाद जो योजनायें और कार्यक्रम बने तथा देष की राजनीतिक सत्ता के लिए जिस तरह की करवट समय समय पर नेताओं ने बदली पर वह गांधी जी के सपनों और सिद्धांत से मेल नहीं खाता। आज हम जीवन के हर क्षेत्र में शासन के हस्तक्षेप के मुहताज होते जा रहे हैं। भारत के संविधान में हुए शताधिक संषोधन तथा प्रतिवर्ष नये नये अधिनियमों और अध्यादेशों की प्रस्तावना गांधीजी की विचारधारा के सर्वथा प्रतिकूल है।
