चीन की सेना कितनी ताकतवर? जानें मिथ और सच्चाई

"देखने में भले ही यह बहुत ताकतवर लगती हो लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है जिससे इससे भयभीत हुआ जाए. यह केवल एक 'कागजी शेर' है." 1956 में माओ जेडांग ने अमेरिका के संदर्भ में यह बात कही थी. लेकिन पिछले 30 सालों में चीन के उभार को बहुत शानदार नहीं कहा जा सकता है.

दो अंकों में वृद्धि दर तक पहुंचने के दशकों बीतने के बाद चीन आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और चीन के पास ऐसी सेना भी जो दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक है. कई अस्थिर देशों से सीमा लगने के बावजूद चीन की सीमाएं सुरक्षित हैं. लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था.

2000 सालों में चीन ने बाहरी दुनिया के कई हमले, क्रान्तियां और अपमान झेले. चीन पर आक्रमण हुए, इसे जीता गया और उपनिवेश बनाया गया. लेकिन अब चीन ऐसा नहीं है. चीन 25 सालों में अपने रक्षा बजट पर खर्च तकरीबन 10 गुना बढ़ा चुका है. बीजिंग एक ताकतवर नेवी और तमाम लड़ाकू विमान बना रहा है और लगातार शांति ऑपरेशनों के साथ प्रयोग कर रहा है. एक आक्रामक विदेश नीति के साथ चीनी सेना ने पश्चिम देशों को भी आगाह कर दिया है. कई अमेरिकन नीति-निर्माता बीजिंग की सेना को वॉशिंगटन का करीबी प्रतिस्पर्धी मानते हैं. दूसरे शब्दों मे, दुनिया भर में इकलौता ऐसा देश जो कुछ परिस्थितियों में यूएस मिलिट्री को टक्कर दे सकता है.

लेकिन वे अपने आंकलन में गलत है. सेना को हथियारों से लैस करने में भले ही चीन ने खूब खर्च किया हो लेकिन इसके बावजूद भी चीनी सेना केवल एक 'कागजी ड्रैगन' ही है. जैसा कि माओ ने अमेरिका के संदर्भ में गलत दावा करते हुए उसे एक कागजी शेर करार दिया था. साल दर साल भले ही चीन का सैन्य बजट बढ़ता जा रहा हो लेकिन मुद्रास्फीति ने इस बढ़ोत्तरी से अपनी भूख मिटाई है. चीन की आर्मी, नेवी, एयर फोर्स और मिसाइल कमांड भ्रष्टाचार से बुरी तरह प्रभावित हैं और उनके हथियार पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत पीछे हैं.

धीरे-धीरे चीन की पीपल्स लिबरेशन भले ही आधुनिकीकरण की तरफ आगे बढ़ रही है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बीजिंग अपनी सेना को वैश्विक स्तर के मिशनों में भेज सकता है. दुनिया के ताकतवर देशों के उलट चीन अपने ताकतवर शत्रुओं से घिरा हुआ है.

रूस, जापान और भारत सभी पड़ोसी देश हैं और ऐतिहासिक विरोधी भी. चीन की छोटे राज्यों को टारगेट करती हुई आक्रामक विदेश नीति भी खुद के बचाव के लिए ही है क्योंकि फिलीपीन्स और वियतनाम जैसे देश यूएस, जापान या भारत के साथ गठबंधन कर सकते हैं. चीन के दूसरे पड़ोसी देश भी या तो कमजोर हैं या फिर असफल राज्य जैसे कि पाकिस्तान और उत्तर कोरिया. उनकी अस्थिरता चीन के लिए एक बड़ी सुरक्षा चिंता का सबब है.  इससे साफ हो जाता है कि चीन अपनी सेना पर भारी-भरकम खर्च क्यों करता है.

लंदन के थिंक टैंक इंटरनैशनल इंटस्टिट्यूट फॉर स्ट्रैटजिक स्टडीज के मुताबिक, चीन ने पिछले साल रक्षा क्षेत्र के लिए 151 अरब डॉलर यानी 9 हजार 815 अरब रुपये का बजट आवंटित किया था लेकिन फिर भी यह अमेरिका के 603 अरब डॉलर (39 हजार 198 अरब रुपये) से 4 गुना कम है. हालांकि, यह भारत के मौजूदा रक्षा बजट से 3 गुना ज्यादा है. भारत ने बीते साल 52.5 अरब डॉलर यानी 3 हजार 409 अरब रुपये का रक्षा बजट रखा था.

चीन की आधिकारिक मीडिया ने रक्षा खर्च को बढ़ाकर 175 अरब डॉलर किए जाने पर बताया था कि यह पिछले दो साल की तुलना में थोड़ा अधिक है. 2013 के बाद तीसरी बार रक्षा बजट में इकाई अंक की वृद्धि की गई थी. 2016 में रक्षा खर्च में 7.6 प्रतिशत और 2017 में सात प्रतिशत की वृद्धि की गई थी. एनपीसी के प्रवक्ता झांग येसुई ने कहा था कि अन्य प्रमुख देशों की तुलना में चीन का रक्षा बजट सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और राष्ट्रीय राजकोषीय व्यय का एक छोटा-सा हिस्सा है. उसका प्रति व्यक्ति सैन्य खर्च अन्य प्रमुख देशों की तुलना में कम है. उन्होंने कहा, रक्षा बजट की वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा पूर्व में किये गए कम सैन्य खर्च की भरपाई है और इसका उपयोग मुख्यत: उपकरणों के उन्नयन और सैन्यकर्मियों के कल्याण एवं जमीनी स्तर पर तैनात टुकड़ियों के रहन-सहन के स्तर और प्रशिक्षिण स्थितियों को बेहतर बनाने में किया जाएगा.'

चीन का रक्षा बजट पर खर्च बहुत ज्यादा लगता जरूर है लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है, खासकर चीन की सीमाओं पर मंडराते हुए खतरों को देखते हुए.

खतरों से घिरी स्थिति में-बीजिंग की सीमाएं दुनिया के 3 सबसे ज्यादा अस्थिर देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान और उत्तर कोरिया के साथ लगती हैं. हजारों सालों तक हमले झेलने के बाद आखिरकार चीन ने अपनी सीमाएं सुरक्षित कर ली हैं. अस्थिर पड़ोसी देशों के बीच बीजिंग शांति स्थापित करने में कामयाब रहा है. मैस्च्युट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर टेलर फ्रावेल कहते हैं, 'चीन की स्थल सीमा आज से पहले कभी इतनी सुरक्षित नहीं थी.' वे आगे कहते हैं, 'हालांकि भूटान और भारत के साथ चीन का विवाद कायम है लेकिन चीनी स्थल सीमा पर किसी गंभीर खतरे की संभावना ना के बराबर है. भारत के साथ भले ही सीमाई विवाद के चलते संघर्ष हो सकता है लेकिन इसके भी बड़े युद्ध में बदलने की संभावना कम ही है.'

लेकिन हमेशा से ऐसी स्थिति नहीं थी. मंगोल, रूसी, पश्चिमी उपनिवेशवादियों और हाल में जापान के आक्रमण झेलने के बाद चीन ने बाहरी दुनिया से कई झटके सहे हैं. इतिहास को देखते हुए यह बिल्कुल वाजिब लगता है कि बीजिंग एक मजबूत सेना चाहता है.वियतनाम ने चीन से 1979 में युद्ध लड़ा था और एक ही महीने में पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के 9000 सैनिक मार गिराए थे.  1930 और 1940 में जापान ने लाखों चीनी सैनिक मार गिराए थे. 1962 में भारत के साथ चीन का युद्ध हुआ था. चीन और रूस ने भी 1969 में एक अघोषित और छोटा युद्ध लड़ा.

चीन की सीमाएं 14 देशों के साथ लगती हैं. रूस के ज्यादातर पड़ोसी देश शांत और स्थिर है जैसे- इस्टोनिया, फिनलैंड, नार्वे और लाटविया जबकि चीन के बॉर्डर अफगानिस्तान, उत्तर कोरिया, म्यांमार और पाकिस्तान के साथ लगते हैं और इनमें से दो देशों के पास परमाणु हथियार हैं.

खासकर उत्तर कोरिया खतरनाक देश है. उत्तर कोरिया ना केवल लगातार हिंसा के साथ कूटनीति के साथ चलता है बल्कि इसके हाथ परमाणु हथियार भी है. कोई नहीं जानता है कि अगर उत्तर कोरिया की सरकार गिर जाए और 2 करोड़ 40 लाख लोग बिना सरकार के हो जाए. यह हालत बीजिंग के लिए चिंता का कारण बन सकता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के पास उत्तर कोरिया के लिए एक आपातकाल योजना भी है जिसमें एक बफर जोन बनाने के लिए पीएलए को उत्तर कोरिया भेजा जाएगा. इसी खुलासे को लेकर शायद प्योंगयांग ने बीजिंग को 'छिपा हुआ शत्रु' करार दिया था.वर्तमान समय में चीन भले ही शांति और समृद्धि का अनुभव कर रहा है. लेकिन दूसरी तरफ चीन के लिए पड़ोसी देशों का सिरदर्द सबसे बड़ा है. यही वजह है कि चीन अपने सैन्य बजट को हर साल बढ़ा रहा है.

इसके अलावा, चीन के पास अच्छे और विश्वसनीय सहयोगियों का भी अभाव है. प्रशांत में, यूएस जापान, ताइवान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और फिलीपींस को अपने मजबूत सहयोगी के तौर पर गिन सकता है. इसके अलावा मलेशिया, वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ भी यूएस के अच्छे संबंध हैं. जबकि चीन के प्रशांत में सहयोगियों की लिस्ट बहुत छोटी है- रूस. वैश्विक तौर पर चीन के सहयोगियों में पाकिस्तान, जिम्बाम्ब्वे, वेनेजुएला और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन के देश- पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान हैं. लेकिन इनमें से कई देश अस्थिर हैं और कई देशों के नाम मानवाधिकारों के लगातार उल्लंघन का रिकॉर्ड रहा है.

लेकिन चीन अपने इन 'कमतर पड़ोसियों' को नियंत्रण में रखने के लिए इन्हें गले लगाए हुए है. यह रणनीति पाकिस्तान पर तो कारगर रही लेकिन उत्तर कोरिया के मामले में असफल. म्यांमार में चीन ने दमनकारी सैन्य शासन के साथ दोस्ती निभाने की कोशिश की लेकिन म्यांमार ने बाद में पश्चिम और जापान के साथ साझेदारी कर ली. 2010 के आसपास बीजिंग ने अच्छा दिखने का खेल छोड़ दिया. चीन ने लंबे समय पुराने क्षेत्रीय कब्जों पर दावा करना शुरू कर दिया, जापान और यूएस के बीच की साझेदारी तोड़ने की भरपूर कोशिश की. चीन के पूर्व और दक्षिण-पूर्व के अधिकतर देशों के साथ रिश्ते ठंडे पड़ गए.

यह कहना मुश्किल है कि चीन ने वाकई में कुछ हासिल करने की कोशिश की या नहीं. कई लोगों का मानना है कि चीन छोटे एशियाई देशों का 'फिनलैंडीकरण' करना चाहता है, यानी उस देश की न्यूनतम स्वायत्तता और राजनीतिक व्यवस्था की छूट देते हुए उस देश पर अपनी विदेश नीति थोपना) ताकि उन्हें अमेरिका और चीन के विवाद में उदासीन रखा जा सके. कुछ लोगों का तर्क है कि चीन इन विवादित क्षेत्रों पर कब्जा करना चाहता है लेकिन दूसरी तरफ दूसरे देशों के साथ बराबरी के दर्जे से दिक्कत है.

खैर जो भी हो, चीन अपने इन कदमों की वजह से अकेला पड़ गया है. आज की तारीख में चीन के अधिकतर देशों के साथ रिश्तों की प्रकृति आर्थिक ही है. ये चीन की सैन्य स्थिति के लिए साफ संकेत हैं. जहां अमेरिका प्रशांत क्षेत्र में ज्यादा गतिविधियां कर सकता है वहीं चीन के युद्ध सैन्य केवल अपने क्षेत्रीय पानी में सक्रिय हो सकते हैं या फिर रूसी बंदरगाहों पर. इसके अलावा उसके पास जाने को कोई और जगह नहीं है. रणनीतिक लिहाज से चीन के लिए यह बहुत बड़ा संकट है. बीजिंग के पास बेस उपलब्ध कराने वाला, बोझ हल्का करने, इंटेलिजेंस में मदद करने या फिर नैतिक समर्थन के लिए कोई भी पास नहीं है.

पब्लिक सिक्योरिटी-भारत, यूएस, जापान और अन्य देशों के साथ बढ़ते विवाद के बावजूद चीन बाहरी सुरक्षा से ज्यादा अपनी आंतरिक सुरक्षा पर खर्च कर रहा है.  चीन का आंतरिक सुरक्षा पर खर्च 2007 से तीन गुना हो चुका है. धार्मिक अल्पसंख्यकों वाले इलाकों की सुरक्षा पर चीन का खर्च लगातार बढ़ा है. अधिकतर लोग चीन की सर्वाधिकारवादी सत्ता से नाखुश हैं और पर्यावरण क्षति, भ्रष्टाचार, भूमि अधिग्रहण, लेबर अब्यूज की वजह से कभी भी दंगे भड़कने की स्थिति हो सकती है. चीन के अंदर यथास्थिति बनाए रखने के लिए आंतरिक सुरक्षा पर भारी-भरकम खर्च करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है. जहां चीनी लोगों के लिए यह दुख की बात है वहीं क्षेत्र के लिए यह अच्छी बात है.

चीन अमीर होने से पहले ही बूढ़ा हो जाएगा-चीन की डेमोग्राफी जल्द ही इसे दुनिया का सबसे बड़ा रिटायरमेंट होम बना देगा. चीन में 2050 तक 30 प्रतिशत से ज्यादा लोग 60 साल की उम्र से ज्यादा होंगे. इसके चीन की रक्षा शक्ति पर अप्रत्यक्ष नहीं लेकिन गंभीर परिणाम होंगे. अधिकतर चीनियों के पास रिटायरमेंट बेनेफिट्स नहीं है. इस स्थिति में चीन को सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था बनानी होगी. और यह चीन के लिए मुश्किल चुनाव होगा.

चीन की सीमाएं तो सुरक्षित हैं औऱ यूएस, जापान और भारत चीनी सरकार को गिरा नहीं सकते हैं लेकिन लाखों परेशान चीनी परिवार ऐसा कर सकते हैं. अगर बीजिंग बुढ़ापे में उनकी देखभाल करने में असफल रहता है तो…


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