जलियांवाला बाग नरसंहार की याद दिलाने वाला एक कुआं यहां भी, गर्व का प्रतीक है स्‍मारक

जहां कुएं प्राचीन काल में आम आदमी की प्यास बुझाते थे। उन्हीं में कुछ कुएं ऐसे हुए हैं, जिनका स्वतंत्रता संग्राम में गौरवशाली इतिहास रहा है। ऐसा ही एक कुआं मंगाली मोहब्बत के गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल में है, लेकिन अब इसे ढांप दिया गया है। अब उसके ऊपर घास और झाडिय़ां खड़ी हैं। यह कुआं जलियांवाला बाग नरसंहार की याद दिलाता है। साल 1857 में अंग्रेजों ने धावा बोला था, तब 30 से ज्यादा देशभक्तों ने दमन से बचने के लिए कुंए में छलांग लगा दी थी और वे मौत के मुंह में समा गए थे।

सत्‍यनारायण चेयरमैन बताते हैं कि साल 1857 में मंगाली के क्रांतिकारियों ने हिसार जेल पर धावा बोल दिया था। जिसमें 12 अंग्रेज अधिकारी मारे गए थे। उसके बाद अंग्रेजों ने सेना के साथ मंगाली में पुरानी हवेली को घेर लिया था। हवेली की दीवार ऊंची होने और गेट मजबूत होने के कारण सैनिक अंदर नहीं घुस पा रहे थे। अंदर भारी संख्या में क्रांतिकारी मौजूद थे। फिर अंग्रेजों ने एक भेदिये को पानी निकासी की नाली से पिछले भाग से अंदर प्रवेश कराया था।

 

भेदिये ने नाली से घुसकर मेन गेट का कुंडा खोल दिया था। तब अंग्रेज और सैनिक हवेली में मौजूद क्रांतिकारियों पर टूट पड़े थे। वहां मौजूद करीब 300 क्रांतिकारियों में से काफी ने कुंए में छलांग लगा दी थी। जिनमें 30 से ज्यादा मारे गए थे। अब उस हवेली की जगह सरकारी स्कूल है और वह कुंआ ढांप दिया गया है। सत्‍य नारायण दावा करते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में उनके गांव के करीब 500 लोगों ने कुर्बानी दी थी। अंग्रेजों ने गांव की जमीन कुर्क कर दी थी।   

 

 

 

आपसी भाईचारे की निशानी है यह कुआं

मंगाली में बना कुआं हमेशा से ही आपसी भाईचारे की निशानी है। 15 साल पहले तक इस कुएं पर महिलाओं की भीड़ रहती थी। मगर अब यह कुआं वीरान पड़ा है। मंगाली आकलान के सरंपच राकेश गांधी ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों की स्मृति में जोहड़ के साथ शहीद स्मारक बनाया गया है। यह उनके गांव के गौरवशाली इतिहास को दर्शाता है। साल 2002 के बाद शहीद स्मारक का सुधारीकरण किया गया है।

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