जुए में हारकर जब पांडव वन जाने लगे तो द्रौपदी ने ऐसा क्या कहा, युधिष्ठिर ने मूंद ली आंखें

जिस वक्त सभी पांडव द्रौपदी के साथ वन की ओर जा रहे थे उस वक्त युधिष्ठिर ने क्रोध के कारण अपनी आंखें मूंद रखी थीं। राजा धृतराष्ट्र ने पांडवों के बारे में विदुर से पूछा तो उन्होंने बताया कि युधिष्ठिर इतने क्रोध में हैं कि उनके सामने यदि और इस वक्त आ जाएं तो भस्म हो जाएंगे।
विदुर ने धृतराष्ट्र को बताया कि भीम ने अपनी शक्तिशाली भुजाओं को फैला रखा है। जो अस बात की ओर इशारा हैं कि समय आने पर मैं अपने भुजाओं के बल से कौरवों का नाश कर सकता हूं।
वहीं धनुवीर अर्जुन रास्ते पर ऐसे धूल उड़ाते हुए चल रहे थे मानों वह बताना चाह रहे हों कि युद्ध होने पर ऐसे ही धूल के समान बाणों की वर्षा करेंगे।
वहीं नकुल और सहदेव को तो कोई पहचान ही नहीं सकता था। क्रोध से आगबबूला इन दोनपों अनुजों ने अपने पूरे शरीर पर धूल मल ली थी। मानों कहना चाह रहे हों कि युद्धभूमि में कौरवों को ऐसे ही धूल चखाएंगे।
फटे-पुराने वस्त्र पहने द्रौपदी ने अपने केश खोल रखे थे और रोती हुई कौरवों के नाश की बात करते हुए चले जा रही थी। उन्होंने चलते समय कहा है कि जिनके कारण मेरी यह दुर्दशा हुई है, उनकी स्त्रियां भी आज से चौदहवें वर्ष के बाद अपने स्वजनों की मृत्यु से दु:खी होकर इसी प्रकार हस्तिनापुर में प्रवेश करेंगी। ठीक ऐसा ही हुआ भी।
राजसी ऐशोआराम छोड़कर वन में जीवन बिताने निकले पांडवों के लिए महल के मखमल के बिस्तरों को छोड़कर वन में पहली रात बिताना आसान नहीं था। पत्नी समेत इन पांचों ने प्रमाण नाम के एक बरगद के पेड़ के नीचे रात बिताई।
रात बिताने के बाद जब ये सभी उठकर फिर से वन की ओर चल पड़े तो इन्होंने देखा कि कुछ ब्राह्मण भी इनके साथ हो लिए। वन में अपने खाने का ठिकाना नहीं था और ब्राह्मणों को अपने साथ आता देख युधिष्ठिर को उनको खिलाने-पिलाने की चिंता सताने लगी।
युधिष्ठिर ने निराश होकर भगवान सूर्य से मदद मांगी। तब सूर्य देवता ने उन्हें तांबे का अक्षय पात्र देकर कहा कि तुम्हारी रसोई में जो कुछ बनेगा वो तब तक खाली नहीं होगा, जब तक द्रौपदी उसे परोसती रहेगी।
