दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक श्रेणी में बड़ा

नई दिल्ली । मौसम की अंगड़ाई के साथ सिर्फ खानपान, रहनसहन और कैलेंडर ही नहीं बदलता, दिल्लीएनसीआर में रहना है तो यहां के पर्यावरण और मानवीय जीवन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को लेकर भी सचेत होना जरूरी हो गया है। अक्टूबर से शीत ऋतु के आगमन के साथ ही यहां के वायुमंडल में प्रदूषण की मात्रा इस कदर बढ़ने लगती है कि बगैर निवारण के जीवन मुश्किल हो जाता है। पर्यावरण विभाग तैयारी में जुटने लगता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है क्या वायु प्रदूषण एक दिन या कुछ माह में बढ़ने वाली या रहने वाली परेशानी है।

हम वायुमंडल के लिए अनुकूल वातावरण का उत्सर्जन बारह माह क्यों नहीं करते? दूसरा बड़ा सवाल यह है कि बिगड़ता एयर इंडेक्स सिर्फ एक राज्य या शहर का संकट नहीं बल्कि यह समग्र दिल्लीएनसीआर का सामूहिक संकट है जिससे उभरने को एकरूपता से योजनात्मक तरीके से क्रियान्वयन करना होगा। यहां दिल्ली से लगे एनसीआर के शहरों की भूमिका और भागीदारी भी भिन्न नहीं रह सकती। यदि दिल्ली में जेनरेटर पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है तो एनसीआर को भी उसी तरह नियम निर्धारित करने होंगे।

एनसीआर में संचालित औद्योगिक इकाइयों में भी पर्यावरण के दृष्टिकोण से मानकों का पालन कराने में सख्ती नहीं नजर आती। सवाल यही उठता है कि एनसीआर के शहरों में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण होने से दिल्ली किस तरह प्रभावित हो रही है? वहीं, जब वायु प्रदूषण दिल्ली के साथ ही एनसीआर के शहरों को भी प्रभावित कर रहा है तो एनसीआर में प्रदूषण पर नियंत्रण के ठोस उपाय क्यों नहीं किए जाते?

साल दर साल वायु प्रदूषण के बढ़ते ग्राफ से दिल्लीएनसीआर में लोगों की सांसें थम रही हैं। फेफड़े छलनी हो रहे हैं, लेकिन इस पर रोकथाम के लिए हर साल केवल योजनाएं ही बनती हैं। उस पर गंभीरता से अमल जिम्मेदारों पर कार्रवाई संबंधित विभाग और अधिकारियों की प्राथमिकता में शामिल ही नहीं है। दिल्ली में तो सूरत बदली पर एनसीआर के शहरों में तो डीजल चालित जेनरेटरों पर प्रतिबंध लगा और ही वाहनों को सीएनजी में परिवर्तित किया गया। उसी का परिणाम है कि दिल्लीएनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर लगातार खतरनाक से बेहद खतरनाक श्रेणी में बना रहता है।

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