पंचकल्याणक महामहोत्सव में तपकल्याणक की हुई आराधना

भोपाल। मंदाकिनी जिनालय पंचकल्याणक महामहोत्सव में आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज के संसघ सानिध्य में तपकल्याणक की आराधना हुई। आचार्य श्री के करकमलों द्वारा पाषण से भगवान बनने जा रही जिन प्रतिमाओं पर संस्कारोपण किये गये। पंचकल्याणक के मंच से जहाँ एक ओर युवराज आदिकुमार के विवाह उत्सव का प्रस्तुतिकरण किया गया। वहीं दूसरी ओर युवराज आदिकुमार के वैराग्य के दृश्य को देखकर सम्पूर्ण श्रद्धालुओं के भाव सांसारिक विरक्ति की ओर बढ़ रहे थे। महाराजा नाभिराय का दरबार सजा, जिस पर युवराज आदिकुमार का राजतिलक मुकुटबद्ध राजाओं द्वारा भेंट और राज नृतकी नीलांजना के नृत्य को देखकर युवराज आदिकुमार को वैराग्य उत्पत्ति को देखकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो गये। साथ ही तपकल्याणक की क्रियायें सम्पन्न हुईं। महामहोत्सव के प्रमुख पात्र सौधर्म इंद्र, कुबेर, महायज्ञनायक, यज्ञनायक आदि प्रमुख पात्रों द्वारा धार्मिक अनुष्ठान किये गये। 56 कुमारियाँ द्वारा कलशो द्वारा जिनालय की शुद्धि की गई।
आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने आशीष वचन में कहा स्वात्म सिद्धि का कोई साधन है तो वह ध्यान है। ध्यान साक्षात् निर्वाण का साधन है। ध्यान से सर्वसिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। चित्त की एकाग्रता का नाम ध्यान है। चैतन्य आत्मा का चैतन्य आत्मा में विलीन करने का नाम ध्यान है। ईंट, चूने की दीवार ध्यान केन्द्र नहीं होते, जिस स्थान पर चित्त एकाग्रचित हो जाये वही ध्यान होता है। आचार्य श्री ने कहा दिन में मंगल की खोज मत करो दिल में मंगल कर लो तो संसार में मंगल ही होगा, अगर भाव मंगल है तो सारा जग मंगल है। घोर चिन्ता का विषय है कि वर्तमान में कुछ ज्योतिषियों ने व्यक्तियों के पुण्य-पाप को वास्तु में बदल दिया है। अशुभ सोचने वालों का अशुभ ही होता है और शुभ भावों का फल शुभ ही होता है। जैसी भावना रखोगे वैसा ही फल पाओगो।
आचार्य श्री ने आगे कहा कि जो संयम शून्य हो जाते हैं वे अभूतपूर्व हो जाते हैं और जो संयम के साथ जाते हैं वह भूतपूर्व हो जाते हैं। जो देश को सम्प्रदाय के नाम, धर्म के नाम खण्ड-खण्ड कर रहे हैं, उनसे बड़ा हिंसक कोई नहीं है। सम्प्रदाय की आड़ लेकर धर्म को विघटित करना सबसे बड़ी हिंसा है। परमात्मा ज्ञाता है, परमात्मा स्वयं में ज्ञायक है वह किसी का कर्ता नहीं होता। भगवान ने चित्तवन नहीं किया, भगवान ने वस्तु स्वभाव की व्याख्या की है, जिसमें न्यूनता न हो, जिसमें अधिकता न हो, जो आगम है, वही कहना, इसी का नाम तत्वउपदेश है।
मंदिर समिति के अध्यक्ष डॉ. मुकेश जैन ने बताया कि शुक्रवार को कैवल्यज्ञान कल्याणक की आराधना होगी, प्रात: 6:00 बजे जिन अभिषेक, शांतिधारा, 9:00 बजे आचार्य श्री द्वारा दिव्यदेशना, दोपहर 12:30 बजे अधिवासना, तिलकदान, मुखोद्घाटन, नयनोन्मीलन आदि ज्ञान कल्याणक की क्रियायें होंगी। शनिवार 18 मई को भव्य गजरज फेरी के साथ पंचकल्याणक महामहोत्सव का समापन होगा।
