राजनीति के अज्ञातवास पर बोले कुमार विश्‍वास, केवल चुनाव लड़ना ही तो सियासत नहीं

पटना । युवा दिलों की धड़कन डॉ. कुुमार विश्वास शनिवार को दैनिक जागरण के कवि सम्मेलन में शामिल होने के लिए पटना में थे। इस दौरान उन्‍होंने साहित्य, राजनीति के साथ युवा प्रतिभाओं से जुड़े सवालों का इत्मीनान से जवाब दिया। उन्‍होंनें राजनीति से अपने अज्ञातवास पर भी बातचीत की। कहा कि केवल चुनाव लड़ना ही तो सियासत नहीं है। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश… 
प्रश्‍न: आपको नहीं लगता कि सूचनाओं की भीड़ में आज शब्द अपने मानी खोते जा रहे हैं? कविताओं की भी उम्र कम हो गई है? 
उत्‍तर: यह भारतीय समाज का मीडियोक्रेसी पीरियड है। फ्रेम चलता है- एक्सिलेंस का, ब्रस्‍ट का, मीडियोक्रेसी का। राजनीति से लेकर कविता तक और पत्रकारिता से लेकर खेलों तक मीडियोक्रेसी चल रही है। शब्द के लिए खराब वक्त है, लेकिन जिस तरह नए लोग लिख रहे हैं, बोल रहे हैं, मैं आशांवित हूं, निराशा में नहीं हूं। खराब दौर खत्म होने को है। खीर हो या चाय जब पकेगी तो उसकी खुशबू बता देगी। इसी तरह बातों को भी पकने का समय चाहिए। अच्छी चीजें अगर लिखी जाएंगी, कही जाएंगी तो आज नहीं तो कल निश्चित ही सराही जाएंगी। 

प्रश्‍न: मंचीय कविताओं को भी क्या अतिवाद से नुकसान हुआ है? 
उत्‍तर: यह तो लिखने-पढऩे वालों की जिम्मेदारी है। आयोजकों की भी। जिम्मेदारी जनता की भी है वे अकवियों को सुनना बंद करें। सबसे बड़ी जवाबदेही कवियों की है कि वे कविताओं में नव्यता लाएं। बार-बार वह मंच से एक ही बात नहीं सुना सकता। कवि नवीनीकरण पर ध्यान दें। अति कष्ट तो दे रही है, मगर इसका एक फायदा भी है कि नए-नए लोग आ रहे हैं। नई प्रतिभाएं उभर रही हैं, फिर चाहे वो कविता का मंच हो या फिल्मों की दुनिया। कवि सम्मेलनों के कवियों का चयन भी लोकतांत्रिक हुआ है। 
प्रश्‍न: पहले बड़े कवि-शायर फिल्मों में भी समान रूप से गीत लिखते थे, आज ऐसा नहीं दिखता? 
उत्‍तर: मैंने भी जिन फिल्मों में गाने लिखे हैं, उनसे मैं खुश नहीं हूं। परमाणु का गाना हिट भी हुआ, लेकिन मुझे नहीं पसंद। म्यूजिक डायरेक्टर ने बीट पर डमी दी और एक घंटे में गाना लिख दिया। कविता ऐसे नहीं लिखी जाती। मुगल-ए-आजम 12 साल में बनी। पहले गाने की बैठकें ज्यादा होती थीं। अब सबकुछ इंस्टेंट होता है। पहले प्रोड्यूसर-डायरेक्टर भी लिखने-पढऩे वालों की सोहबत में होते थे, अब गाने तो गाने, फिल्मों के टाइटल भी गानों से चुराए जा रहे हैं। मैं कुछ दिन पहले स्वीडन और स्पेन की फिल्में देख रहा था, इतनी कम आबादी वाले देश में भी गजब की क्रिएटिविटी है। अपने यहां भी टैलेंट है, उसे बस मौका देने की जरूरत है। 

प्रश्‍न: पिछली बार जब आपसे बातचीत हुई थी तो आपने नए कवियों के लिए टीवी पर टैलेंट हंट शो की बात कही थी? 
उत्‍तर: इस दिशा में एक चैनल से बातचीत चल रही थी मगर बाजार अब भी कविता के मार्केट को समझ नहीं पा रहा है। वो मुझे तो शो दे रहे हैं, मगर मैं जिस तरह जिन लोगों को ब्रांड बनाना चाहता हूं, वैसा हो नहीं पा रहा। एक निर्माता ने कुछ लाख रुपये खर्च कर पायलट शो भी बनाया, उसे मार्केट में रिव्यू के लिए भेजा गया, मगर शायद अनुकूल समाचार नहीं रहा होगा, इसलिए बात आगे नहीं बढ़ी। 
प्रश्‍न: आप 'युवाज' के जरिए भी नए लोगों को प्रमोट कर रहे हैं? 
उत्‍तर: हां, वो पूरी तरह मेरी निजी पहल है। इसमें मैं अपने निजी सोशल मीडिया अकाउंट से युवा कवियों-शायरों का प्रमोशन करूंगा। आज ही 'युवाज' की पहली शूटिंग भी हुई है। इसके लिए देश भर से 4300 आवेदन आए थे। तीन महीने से मेरी टीम इस पर काम कर रही है। कोशिश है कि हर माह 16 युवाओं को सोशल मीडिया के मंच से प्रमोट किया जाए। 
प्रश्‍न: राजनीति में आपका 'अज्ञातवास' कब खत्म होगा? 
उत्‍तर: कोई अज्ञावतास नहीं है। राजनीति कर रहा हूं। सिर्फ चुनाव लड़ना या राज्यसभा जाना ही राजनीति नहीं है। कवि सम्मेलनों के मंच से रोज 50 हजार लोगों के बीच होता हूं, मेरे लिए यह भी राजनीति है।

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