लालू को बेल… मांझी का वार्म वेलकम, सहनी की चुप्पी, सुमो की बेचैनी और बिहार की सियासत में होने लगी हलचल!

पटना. राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को जमानत मिलने के साथ ही बिहार की सियासत में भी हलचल मच गई है. खास तौर पर एनडीए खेमे में उनकी रिहाई को लेकर बेचैनी महसूस भी की जा सकती है. सोमवार को जब बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और वर्तमान में भाजपा के राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी (बिहार की सियासत में इन्हें 'सुमो' भी कहा जाता है) ने जब यह कहा कि लालू प्रसाद को जमानत मिलने या न मिलने से बिहार की राजनीति और न्याय के साथ विकास की प्रशासनिक संस्कृति पर कोई असर नहीं पड़ेगा, तो राजनीतिक जानकारों ने जल्द ही ताड़ लिया कि कहीं न कहीं एनडीए के भीतर कुलबुलाहट तो है.

दरअसल, एनडीए खेमे की यह बेचैनी तब से और भी बढ़ गई है जब से हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने आरजेडी सुप्रीमो की जमानत का स्वागत किया. फिलहाल एनडीए के खेमे में शामिल मांझी की पार्टी हम के प्रवक्ता दानिश रिजवान ने यह भी कहा कि जीतन राम मांझी उनके स्वास्थ्य को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे उनकी रिहाई के इंतजार में थे. अब जब उन्हें रिहाई मिली है तो हम सब बेहद खुश हैं.

मांझी-सहनी पर आगामी सियासत का दारोमदार

दूसरी ओर एनडीए मंत्रिपरिषद के विस्तार में हिस्सा की चाहत रखने वाले विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी की नाराजगी भी दबी जुबान में ही सही, बाहर आ चुकी है. मांझी और सहनी या तो मंत्रिपरिषद में और हिस्सा चाहते थे या फिर एक-एक एमएलसी सीट की दोनों की चाहत थी. हालांकि, एनडीए सरकार को समर्थन दे रहे इन दोनों ही नेताओं की कोई उम्मीद पूरी नहीं हो पाई. ऐसे में लालू खेमे में रह चुके इन दोनों ही नेताओं की आगामी योजना को लेकर कोई कुछ भी विश्वास के साथ नहीं कह सकता.

एक बार फेल हुए तो क्या बार-बार नाकामयाब ही होंगे?

वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि लालू यादव दिल्ली में रहें या पटना-रांची या कहीं और राजनीति उनकी रगों में है. माना जाता है कि चारा घोटाले में 23 दिसंबर 2017 को जेल जाने के बाद से लालू लगातार पर्दे के पीछे से ही राजनीति करते आ रहे थे. तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद के बेहतरीन प्रदर्शन के बाद जब वह जेल में थे तब भी उन्होंने बिहार में तेजस्वी यादव की सरकार बनाने के लिए काफी कोशिश की थी. हालांकि, तब वे नंबर गेम में कामयाब नहीं हो पाए थे.

अब तो साक्षात लालू यादव का सामना करना पड़ेगा!

रवि उपाध्याय कहते हैं कि बेशवक तब वे सत्ता की सियासत में सफल नहीं हुए, लेकिन उनके सशरीर उपस्थिति के बगैर भी बिहार की सियासत में उनकी मौजूदगी दर्ज की जाती रही. अब जब  लंबे अंतराल के बाद जेल से बाहर आकर बिहार की राजनीति को पूरा समय देंगे तो उसका मनोवैज्ञानिक असर पड़ना ही पड़ना है. जाहिर है विपक्षी खेमे के साथ-साथ सत्ता पक्ष भी लालू के असर से वंचित नहीं रह सकता है. लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने एक बयान में कहा भी है कि लालू यादव की रिहाई के साथ ही अब नीतीश सरकार की सत्ता से विदाई तय है.

लालू को मिली बेल तो उठने लगे सियासत के सवाल

इसके साथ ही सवाल यह भी है कि लालू प्रसाद बाहर आएंगे तो बिहार की सियासत को नई धार दे पाएंगे? या फिर उनका पूरा फोकस राजद में सीएम नीतीश के खेमे से लगाए जाने वाली संभावित सेंध को बंद करने पर रहेगा? इस मामले पर वरिष्ठ राजनीति विश्लेषक प्रेम कुमार कहते हैं कि विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सीमा से आगे जाकर लालू को अभियान चलाते हुए देखा जा चुका है.

बिहार में सत्ता का गणित ही कुछ ऐसा है…

प्रेम कुमार कहते हैं कि लालू को लेकर एनडीए खेमे में बेचैनी इसलिए भी है कि इस बार बिहार विधानसभा का सियासी गणित कुछ ऐसा है ही कि हल्की हलचल में भी बड़ा सियासी उलटफेर हो सकता है. दरअसल, महागठबंधन की 110 सीटें हैं, जिनमें आरजेडी के 75, कांग्रेस के 19 और लेफ्ट पार्टी के 16 विधायक हैं.

ओवैसी की पार्टी के विधायकों का क्या होगा रुख?

प्रेम कुमार सियासी गणित समझाते हुए कहते हैं कि 243 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 122 विधायकों का समर्थन चाहिए. फिलहाल एनडीए में 127 विधायक हैं. इनमें बीजेपी के 74, जेडीयू के 44, हम के 4, वीआईपी के 4 और एक निर्दलीय हैं. सोमवार को जेडीयू के विधायक मेवालाल चौधरी के निधन से एक सीट खाली हुई है. इसके अलावा 5 विधायक असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के हैं.

तो क्या लालू पाट पाएंगे 12 सीटों का फासला?

बिहार के इसी सियासी गणित को समझाते हुए प्रेम कुमार कहते हैं कि लालू प्रसाद यादव यहां बड़ा कमाल कर सकते हैं. दरअसल, जिस अंदाज में मांझी की पार्टी ने लालू की रिहाई का स्वागत किया है, यह एक सियासी संदेश भी माना जा सकता है. ऐसे में अगर मांझी अपने चार विधायकों के साथ पाला बदलते हैं तो 110+4 यानी 114 का आंकड़ा बनता है. यानी बहुमत से महज 8 सीटें दूर.

ठीक-ठाक ऑफर मिले तो हो सकती है बड़ी हलचल!

ऐसे में अगर AIMIM की पार्टी के पांच विधायकों का समर्थन महागठबंधन को मिल जाता है तो यह संख्या 119 तक पहुंच जाती है. यहां लालू यादव अपने लालू यादव की नजर अब बस यहां एनडीए से नाराज चल रहे मुकेश सहनी पर टिकी हो सकती है. अगर इनके चार विधायकों को ठीक-ठाक ऑफर मिल जाए तो आने वाले समय में बिहार की सियासत में हलचल मचनी तय है.

सामने नीतीश कुमार भी तो कम नहीं…

हालांकि, रवि उपाध्याय कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ एनडीए में खतरा पैदा होगा, बल्कि राजद सुप्रीमो के सामने अपने विधायकों को भी एकजुट रखने की बड़ी चुनौती होगी. बेशक तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद अकेले सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आया है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी राजनीति के चाणक्य कहे जाते हैं. उनकी खामोशी भर से ही जदयू से विरोधी दल हमेशा सशंकित रहते रहे हैं.

बिहार की राजनीति और वेट एंड वाच की रणनीति

अब तक राजद में भी टूट की आशंका जताई जाती रही है, लेकिन लालू यादव की रिहाई के साथ यह खतरा कम हो गया है. हालांकि, ऐसा नहीं है कि यह खतरा बिल्कुल ही टल गया है. नीतीश कुमार अभी सत्ता में हैं और भाजपा का भरपूर समर्थन उन्हें प्राप्त है. एक निर्दलीय विधायक का समर्थन उन्हें है और बसपा के विधायक जेडीयू में चले ही गए हैं. हाल में ही AIMIM के पांचों विधायकों ने सीएम नीतीश से मुलाकात भी की थी. ऐसे में क्या होगा कहना फिलहाल मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि दोनों ही पक्ष बेचैन रहेंगे और बिहार की सियासत में हलचल होती रहेगी.
 

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