सपा-बसपा के सामने 2022 के पहले चुनौतियों का पहाड़, गठबंधन के वोट बंटे और घटे भी

उत्तर प्रदेश में बने बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन ने अपने वोटर समूहों के लिए नारा दिया था- “एक भी वोट न बंटने पाए, एक भी वोट न घटने पाए.” लेकिन यूपी की 80 सीटों के चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि गठबंधन में शामिल दलों के वोट न सिर्फ बंट गए बल्कि घट भी गए. पिछड़े, दलित और मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा हासिल कर लेने के अंकगणित के सहारे चुनावी कामयाबी पाने की गठबंधन की रणनीति नाकाम रही. भाजपा वोटरों के बड़े तबके को यह बताने में सफल रही कि सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन महज कुछ जातियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है.
नतीजा यह रहा कि गठबंधन के खिलाफ जमीन पर गैर यादव पिछड़ों और गैर जाटव दलितों ने अपना गठबंधन बनाकर भाजपा के लिए वोट किया. जिसे अगड़े वोटों का भाजपा के पक्ष में हुए जबरदस्त ध्रुवीकरण का खासा साथ मिला. नतीजों में उम्मीदें न पूरी होने के बाद अब सपा और बसपा के सामने चुनौतियां बड़ी हैं. महज गठबंधन के गुणा-भाग से काम नहीं चलेगा यह स्पष्ट है. यह सही है कि मंडल राजनीति से निकलकर मजबूत हुईं इन दोनों पार्टियों ने गए कुछ वर्षों में नए समूहों को जोड़ने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. 2007 में समाज के लगभग हर तबके का वोट पाकर मायावती ने यूपी में बहुमत की सरकार बनाई थी तो 2012 में यही बात सपा पर लागू हुई थी. जब उसे समाज के हर तबके ने वोट देकर बहुमत की सरकार बनाई थी.
उसके बावजूद इन दलों का नेतृत्व गैर यादव पिछड़ों या गैर जाटव दलितों और अगड़ों को अपने पाले में रखने की सियासत करने में नाकाम रहा. नतीजा 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में दिखा. जब भाजपा ने गैर यादव पिछड़ों, खास कर अति पिछड़ों और गैर जाटव दलितों को अपने पाले में करने की मुहिम चलाई और कामयाबी भी पाई. उसके बावजूद न सपा और न बसपा ने 2019 के मद्देनजर अपनी सियासी रणनीति में संशोधन किया. नतीजा यह रहा कि गठबंधन के खिलाफ जमीन पर गैर यादव पिछड़ों और गैर जाटव दलितों ने अपना गठबंधन बनाकर भाजपा के लिए वोट किया. जिसे अगड़े वोटों का भाजपा के पक्ष में हुए जबरदस्त ध्रुवीकरण का खासा साथ मिला. वहीं कांग्रेस को जिन दिग्गजों के जीतने की उम्मीद थी, उनकी भी जमानत जब्त हो गईं.
गठबंधन कर लेने और चुनावी रैलियों को संबोधित कर देने भर से सफलता हासिल कर लेने का उनका भ्रम गलत साबित हुआ, गठबंधन 15 सीटें ही जीत पाया ओर उसमें भी बसपा ज्यादा फायदे में रही, जिसने 10 सीटें हासिल कर लीं जबकि 2014 में उसका खाता भी नहीं खुला था.
सपा पिछली बार की तरह इस बार भी पांच सीटों पर ही रही लेकिन डिम्पल यादव, अक्षय यादव और धर्मेन्द्र यादव चुनाव हार गए. रालोद का खाता तक नहीं खुला और अजित सिंह व जयंत चौधरी भी हार गए. पिछले चुनावों में इन दलों का सम्मिलित वोट प्रतिशत करीब 43 फीसदी था, जो भाजपा के बराबर था. और इसलिए यह अनुमान लगाया जा रहा था कि गठबंधन से भाजपा को कड़ी टक्कर मिलेगी. लेकिन यह नहीं हुआ. इन तीनों दलों का सम्मिलित वोट प्रतिशत 2019 में करीब 37 फीसदी आता दिख रहा है, जो पहले से करीब 5-6 फीसदी कम है. जबकि भाजपा का वोट प्रतिशत लगभग 5-6 फीसदी बढ़कर करीब 50 प्रतिशत के आंकड़ों को छू गया है.
लिहाजा यह साफ है कि भाजपा ने न सिर्फ अपना वोट बचाए रखा बल्कि इन दलों के वोट में सेंध भी लगाई. खास कर सपा के वोट में क्योंकि सपा को पिछले चुनावों में मिला करीब 22 फीसदी वोट इस बार घट कर करीब 18 फीसदी रह गया है, जबकि बसपा ने 19 फीसदी वोट के अपने पिछले आंकड़े को बचाए रखे. मंडल राजनीति से निकले इन दलों के वोट आधार में भाजपा की भारी सेंधमारी ने इन दलों का सियासी आधार हिला दिया है. यह माना जा रहा है कि भाजपा के इस उभार से निपटने के लिए सपा, बसपा और रालोद फिलहाल एक रहेंगे लेकिन बड़ा सवाल है कि 2022 में होनेवाले यूपी विधानसभा चुनाव के लिए उनकी रणनीति क्या होगी?
महज गठबंधन का अंकगणित काम नहीं करेगा, यह साफ हो चुका है. ऐसे में सपा और बसपा दोनों के अंदर नतीजों के बाद यह बातें उठने लगी हैं कि सामाजिक आधार का दायरा बढ़ाना होगा और नए दौर की राजनीति को समझते हुए प्राथमिकताएं तय करनी होंगी क्योंकि सिर्फ जातीय आंकड़ों के गुणा-भाग से चुनावी सफलता नहीं मिल सकती. इतना ही नहीं गठबंधन के दलों के नेताओं के लिए बड़ी चुनौती यह समझने की भी है कि क्या महज सीटों के तालमेल वाली प्रबंधन की राजनीति से परे जाकर वे संगठन और जनता के बीच जाकर संघर्ष की राजनीति को तवज्जो देंगे? ये चुनौतियां और इनसे निपटने के लिए गठबंधन के दलों के नेताओं की पहलकदमी ही बताएगी कि 2022 के चुनावों में यूपी का विपक्ष भाजपा को कैसी और कितनी चुनौती दे पाएगा?
