स्वयं अपने गुनहगार होने से दोषमुक्त होने के लिए देश, परिवार और समाज के प्रति दायित्व निभाएं

इन्दौर । यदि मेरे साथ कुछ अच्छा नहीं हो रहा है और यदि मैं दुखी हूं तो इसके लिए कोई और नहीं, मैं स्वयं ही गुहनगार हूं क्योंकि मैंने अस्थाई और नए रिश्तों को बनाने के चक्कर में अपने स्थाई और पुराने रिश्तो को भुला दिया हैं। मैंने परिवार को समय देना बंद कर दिया है। मैंने सरकार, समाज और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भुला दिया है। यही नहीं, मैने अपने हित में मान्य प्रतिबंधों को भी भुला दिया है। यदि मुझे इन त्रुटियों में सुधार करना है तो मुझे अपने अंतर्मन में राष्ट्र प्रेम का भाव जगाना होगा, देश में पर्याप्त अन्न की पैदावार में भागीदार बनना होगा और देश में सशक्त सेना की मौजूदगी में भी सहयोग करना होगा। इन सब में राष्ट्र प्रेम सबसे महत्वपूर्ण है क्योकि देश की संप्रभुता तभी अक्षुण्य रह सकेगी।
राष्ट्र संत, पद्मविभूषण प.पू. आचार्यदेव रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. ने आज सुबह विजय नगर जैन श्रीसंघ के तत्वावधान में परिवर्तन प्रवचनमाला के अंतर्गत ‘मैं ही खुद का गुनहगार हूं’ विषय पर धर्मसभा में एक आम आदमी के दर्द को इन शब्दों मे व्यक्त किया। प्रारंभ में विजय नगर श्रीसंघ की ओर से अल्पेश शाह, आर.सी. जैन, संजय पोरवाल, आशीष शाह एवं आयोजन समिति के कल्पक गांधी, दिलीप सी. जैन एवं अपूर्व डोसी ने सभी साधु-साध्वी भगवंतों की अगवानी की। प्रवचनमाला से जुड़े कल्पक गांधी एवं अनिल रांका ने बताया कि 23 से 25 जून तक आचार्यश्री के प्रवचन प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक अनुराग नगर में होंगे। रविवार 23 जून को ‘लाईन ऑफ कंट्रोल‘, सोमवार 24 को ‘क्या बनना था, क्या बन गया‘ और मंगलवार 25 जून को ‘उत्साह ही उत्थान का मूल हैं‘ जैसे दिलचस्प विषयों पर प्रवचन होंगे।
आचार्यश्री ने विजयनगर की धर्मसभा में कहा कि हम नए रिश्तों को बनाने के फेर में पुराने रिश्तों को भूलाते जा रहे हैं। नए रिश्तों को निभाने के लिए जरूरी है कि हम क्षमा का रास्ता अपनाए, क्यांेकि क्षमा सबसे बड़ा अस्त्र है। हम अपनी ओर से सभी जीवों को अभय दान दे सकें तो इससे अच्छा और श्रेष्ठ कोई और मार्ग नहीं हो सकता। अपने परिवार को भी समय देना जरूरी है। विडंबना यह है कि हमारे पास या तो परिवार के लिए समय नहीं है या समय होते हुए भी हमारी प्राथमितकता में परिवार थे ही नहीं। यदि बच्चे माता-पिता के पास नहीं बैठना चाहते हैं तो इसका अर्थ यही है कि माता-पिता उन्हे बेटर नहीं लगते। उनके लिए मोबाईल, टीवी और उनके मित्र ही प्राथमिक है। माता-पिता उन्हे मोबाईल, टीवी और मित्रों की तुलना में बेटर लगेंगे तो ही वे माता-पिता के पास बैठना पसंद करेंगे। गुड को छोड़ कर बेटर को पसंद करने का यहीं मनोविज्ञान है। दरअसल, हम अपने गुनहगार इसलिए भी है कि हमने देश या सरकार के प्रति, समाज के प्रति और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियां भुला दी हैं। इन तीनों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को तो हमने भूला ही दिया, उन प्रतिबंधों को भी भुला दिया है, जो स्वयं हमारे हित में लागू किए गए। अब इन सबमें सुधार करने के लिए हमें अपने परिवार के प्रति समय देना होगा, राष्ट्र ओर समाज के लिए भी समय निकालना होगा। कन्फ्यूसियस के अनुसार किसी देश की संप्रभुता तभी अक्षुण्य रह सकेगी जब वहां के नागरिकों में राष्ट्र प्रेम हो, देश के पास पर्याप्त अन्न और सशक्त सेना हो। इन सबमें राष्ट्र प्रेम सबसे महत्वपूर्ण है।
