जमुई में महादेव के 5 ऐसे धाम, जहां दर्शन मात्र से मिटते हैं कष्ट! भक्त यहां से नहीं जाते खाली हाथ

जमुई जिला आस्था, पौराणिक कथाओं और धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है. यहां कई प्राचीन शिव मंदिर हैं, जिनका इतिहास काफी पौराणिक है. सावन, महाशिवरात्रि और मकर संक्रांति जैसे पर्वों पर इन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. इनमें से एक मंदिर तो पहाड़ की चोटी पर स्थित है.  
 भगवान भोलेनाथ की पूजा के लिए जमुई जिले में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं. आप यह परिवार के साथ पूजा अर्चना भी कर सकते हैं, साथ ही आप यहां घूमने भी जा सकते हैं. इन मंदिरों का इतिहास पुराना है.
 खैरा प्रखंड के चर्चित गिद्धेश्वर मंदिर का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है. करीब 3 एकड़ 88 डिसमील क्षेत्र में फैले इस मंदिर परिसर का निर्माण वर्ष 1941 में महाराज गिद्धौर के तत्कालीन तहसीलदार लाला हरिनंदन प्रसाद ने कराया था. मान्यता है कि गिद्धेश्वर पर्वत के समीप उन्हें एक शिवलिंग प्राप्त हुआ था, जिसे वे अपने साथ ले जाना चाहते थे. लेकिन उसी रात उन्हें स्वप्न आया कि भगवान शिव का मंदिर उसी स्थान पर बनना चाहिए, जहां शिवलिंग की प्राप्ति हुई थी. इसके बाद मंदिर का निर्माण कराया गया. एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार रामायण काल में गिद्धेश्वर पर्वत पर गिद्धराज जटायु का निवास था और सीता हरण के समय रावण से उनका युद्ध यहीं हुआ था. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं और सावन में विशेष पूजा होती है.

 झाझा मुख्य मार्ग पर बरहट प्रखंड क्षेत्र में किउल नदी के तट पर स्थित पतनेश्वर पहाड़ धार्मिक और प्राकृतिक आस्था का अनोखा संगम है. करीब 90 फीट ऊंचे पहाड़ की चोटी पर बाबा पतनेश्वरनाथ महादेव विराजमान हैं. श्रद्धालु 104 सीढ़ियां चढ़कर मंदिर परिसर तक पहुंचते हैं. यहां माता पार्वती का भी मंदिर स्थित है. सावन और मकर संक्रांति के अवसर पर यहां भव्य मेला लगता है. मान्यता है कि किउल नदी में स्नान के बाद यहां पूजा करने से सभी मुरादें पूरी होती हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार यहां कुष्ठ रोग तक ठीक हो जाते हैं. ओडिशा के एक कुष्ठ रोगी को स्वप्न में बाबा बैद्यनाथ ने पतनेश्वर धाम आने का आदेश दिया था और एक माह सेवा करने के बाद वह रोगमुक्त हो गया था.

 जिला मुख्यालय के सिकंदरा जमुई मुख्य मार्ग पर स्थित बाबा धनेश्वर नाथ मंदिर भी आस्था का बड़ा केंद्र है. इस मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है, जिन्हें बाबा बैद्यनाथ का उपलिंग भी कहा जाता है. जानकारों के अनुसार यह मंदिर 13वीं सदी से भी पुराना है. बिहार के साथ-साथ बंगाल और झारखंड से भी श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि बाबा धनेश्वर नाथ सभी श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी करते हैं. हालांकि मंदिर और इसके समीप स्थित तालाब का रखरखाव संतोषजनक नहीं है. तालाब सूखने के कगार पर है और रखरखाव के नाम पर सिर्फ औपचारिकता देखी जाती है.

 जमुई जिला मुख्यालय से महज चार किलोमीटर दूर सिंगारपुर में स्थित झिकुटिया महादेव मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है. करीब 300 साल पुराने इस मंदिर में आज भी गैर ब्राह्मण ही मुख्य पुजारी के रूप में पूजा-अर्चना करते हैं. मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ ने एक स्थानीय व्यक्ति को स्वप्न में आकाश की ओर जाते प्रकाश पुंज का दर्शन कराया था. उस समय यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा था. स्वप्न के संकेत पर जब लोग वहां पहुंचे तो शिवलिंग प्रकट अवस्था में मिला. तभी से यहां नियमित पूजा होती आ रही है और यह मंदिर जमुई के प्रमुख शिवालयों में गिना जाता है.

 खैरा बाजार स्थित रावणेश्वर शिव मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है. इस मंदिर का निर्माण चंदेल वंश के महाराज द्वारा कराया गया था और इसका इतिहास सौ साल से अधिक पुराना बताया जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है. सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहां विशेष भीड़ देखने को मिलती है. रावणेश्वर शिव मंदिर न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि खैरा बाजार की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है.

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