पाकिस्तान पर दबाव बनाने के पीछे कहीं अमेरिका की ये रणनीति तो नहीं

नई दिल्ली । ‘अमेरिका ने मूर्खतापूर्ण रीति से पिछले पंद्रह सालों में सहायता के नाम पर 33 अरब से भी अधिक राशि पाकिस्तान को दी है, और उन्होंने हमें बस झूठ, धोखा दिया है कि जैसे हमारे नेता मूर्ख हों। उन्होंने उन आतंकवादियों को पनाह दी, जिन्हें हम अफगानिस्तान में उनकी थोड़ी सहायता से खोज रहे थे। अब नहीं।’ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नए साल के अपने छठे ट्वीट से दक्षिण एशियाई, खासकर पाकिस्तानी राजनीति में खलबली मचा दी। यह ट्वीट बेहद करारा, स्पष्ट और निर्णायक था। भारत-अमेरिकी रिश्तों की तुलना में अमेरिकी-पाकिस्तानी रिश्ते ज्यादा गहरे और शीतकालीन समय के जांचे-परखे रिश्ते रहे हैं, ऐसे में जबकि भारत-अमेरिका रिश्तों की ऊष्मा बढ़ रही तो भारत के लिए भी इस ट्वीट को खास माना गया।
ट्रंप के ट्वीट से पाकिस्तान में मची खलबली
ट्रंप के इस ट्वीट के बाद पाकिस्तान की तिलमिलाहट साफ दिखी और वहां के विदेश मंत्री जनाब ख्वाजा मोहम्मद आसिफ साहब ने उसी ट्विटर पर लिखा कि पाक ट्रंप को जवाब देगा और सच व झूठ अलग-अलग हो जाएंगे। पाकिस्तान ने अमेरिकी राजदूत डेविड हेल को इस संदर्भ में तलब किया और प्रधानमंत्री शाहिद खाकन अब्बासी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (एनएससी) की बैठक हुई जिसमें हाल-फिलहाल कई स्तरों से की जा रही देश की अमेरिकी आलोचनाओं पर बात हुई।
अमेरिका ने हर मंच से की पाक की आलोचना
पाकिस्तान-अमेरिका के रिश्तों में ठंडक की सुगबुगाहट कम-अधिक एक अरसे से दिख रही है पर दिसंबर से यह सर्द सतह पर नजर आने लगी है। दिसंबर में अमेरिकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस ने पाकिस्तान की अपनी यात्र में अफगानिस्तान में शांति प्रयासों में उसकी सिकुड़ी भूमिका की कई बार आलोचना की। फिर तो इसी मुद्दे के बहाने अमेरिकी अधिकारियों के बयानों की झड़ी लगती रही, कभी विदेश सचिव रेक्स टिलरसन, कभी निकी हैले तो कभी जेम्स मैटिस और कई मंचों पर कई बार राष्ट्रपति ट्रंप ने भी पाकिस्तान की खिंचाई की।
अपनी पहली राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के मसविदे में भी अमेरिका ने पाकिस्तान की आलोचना की। पाकिस्तान को दी जा रही गैर नाटो रक्षा सहूलियतों में कटौती की बात की गई और निकी हैले के हवाले से पाकिस्तान को दी जाने वाली 25.5 करोड़ डॉलर की सहायता राशि को फिलहाल स्थगित करने की सूचना दी गई है।
अमेरिका-पाकिस्तान के सामरिक रिश्ते
अमेरिका और पाकिस्तान के ऐतिहासिक रिश्तों की प्रकृति हमेशा से सामरिक रही है। इसमें ‘आदान-प्रदान’ की मुख्य भूमिका रही है और यह रिश्ता एक विश्व-शक्ति का एक क्षेत्रीय राष्ट्र से था। विश्व-राजनीति में विश्व-शक्ति होने का एक व्यावहारिक अर्थ यह भी है कि वह ग्लोब के प्रत्येक सामरिक क्षेत्रों में उसका एक क्षेत्रीय प्रतिनिधि होना चाहिए जो उस क्षेत्र-विशेष में उसके हितों को सुनिश्चित करने में मदद करे। पाकिस्तान ने वह भूमिका अपने लिए स्वीकार कर ली। ट्रंप ने ट्वीट में पिछले पंद्रह सालों का हवाला दिया है।
स्पष्ट है कि ओसामा बिन लादेन को पकड़ने की एबोटाबाद ऑपरेशन तक के पाकिस्तानी सहयोग को चिन्हित किया गया है और उसके बाद के पाकिस्तानी सहयोग को ‘बहुत थोड़ा और विरोधाभासी’ कहा गया है। निश्चित ही 2012 पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों में एक महत्वपूर्ण साल है। अमेरिका के एबोटाबाद ऑपरेशन की पाकिस्तान की भीतरी राजनीति में कड़ी आलोचना हुई। एक तो ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तानी मिलिटरी बेस के भीतर सुरक्षित पाया जाना और फिर अमेरिका का एकतरफा ऑपरेशन जिसमें पाकिस्तानी सरकार कुछ यों पेश आई कि उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था; इसे पाक की संप्रभुता का हनन माना गया और जो था भी।
अमेरिका से बिगड़ते रिश्तों का चीन ने उठाया फायदा
बहरहाल इधर अमेरिका के रिश्ते जितने ही भारत से बढ़ते गए, पाकिस्तान के रिश्ते उभरते विश्व शक्ति चीन से बढ़ते गए। भारत से अमेरिकी मेलजोल जहां पाकिस्तान को रास नहीं आ रहा था वहीं चीन से पाकिस्तानी मेलजोल अमेरिका को पसंद नहीं था। अमेरिकी नाराजगी के मूल में महज पाकिस्तान से ‘अफगानिस्तान में अपेक्षित सहयोग’ का मिलना ही नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान का धीरे-धीरे चीन, रूस और उत्तर कोरिया के साथ संबद्ध हो जाना है। अफगानिस्तान कार्ड तो महज एक दबाव की कार्यनीति है। चीन की ओबोर नीति और बढ़ती सामरिक सक्रियता ने ही अमेरिका को मजबूर किया है कि वह दक्षिण एशिया क्षेत्र को एशिया-प्रशांत क्षेत्र की वृहद् दृष्टि से देखे, जिसमें चीनी सामरिक प्रभाव को भारतीय केंद्रीय भूमिका से संतुलित किया जा सके।
एंटीक्वाड को कमजोर बनाने की रणनीति
दरअसल चीन-रूस-पाकिस्तान-उत्तर कोरिया के प्रतिचतुष्क (एंटीक्वाड) के जवाब में ही अमेरिका-भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया का चतुष्क (क्वाड) निर्मित किया गया है और ट्रंप का यह ट्वीट और अमेरिकी अधिकारियों द्वारा की जा रही लगातार आलोचना एंटीक्वाड की एक प्रमुख धुरी पाकिस्तान पर दबाव बनाकर इसी एंटीक्वाड को कमजोर करने की रणनीति है। व्यवसायी ट्रंप की राजनीतिक शैली वैश्वीकरण के दौर की प्रचलित बहुपक्षीयवाद के स्थान पर द्विपक्षीयवाद की है जो ट्रंप की संरक्षणवादी ‘अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी’ से भी मेल खाती है और अमेरिकी प्रभुत्व को मिलने वाली बहुपक्षीयवाद की चुनौती से भी सुरक्षा मिलती है। द्विपक्षीयवाद नीति में ट्रंप अपने प्रत्येक सहयोगी राष्ट्र से उनकी भूमिका की जवाबदेही स्पष्ट चाहते हैं, जिसके एवज में उन्हें अमेरिकी तवज्जो दी जाती है।
इस साल नवंबर में अमेरिका में कांग्रेस के मध्यावधि चुनावों की संभावना डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी अवाम के नजर में सक्रिय और अमेरिकी डॉलर व अमेरिकी हितों के लिए प्रतिबद्ध दिखते रहने को मजबूर करती है। ट्रंप के चुनावी वादे ही हैं जो अफगानिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति के जान-माल के नुकसानों को न्यूनतम करने के उद्देश्य से पाक और भारत से अफगानिस्तान में और अधिक सक्रियता की बार-बार मांग करते हैं। यकीनन, अमेरिका के रिश्ते भारत से मजबूत हो रहे हैं और पाकिस्तान से उनके रिश्तों में तनाव है, पर भू-राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए अमेरिका का पाकिस्तान से रिश्तों में तनाव की दीर्घकालिक संभावना तलाशना कठिन ही है।
