इस देश के राष्ट्रीय ध्वज पर है विष्णु मंदिर की तस्वीर

हिंदू धर्म के आधार भूत ग्रंथों में बहुमान्य पुराणानुसार विष्णु परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है। कहते हैं पाप का नाश करने के लिए समय-समय पर भगवान विष्णु इस धरती पर प्रकट हुए। कभी मर्यादा पुरुषोत्तम राम, तो कहीं श्री कृष्ण के अवतार में भगवान ने अपने भक्तों के कष्ट दूर किए। इस कलयुग में भी उनके भक्तों की श्रद्धा उनके प्राचीन इन मंदिरों में देखने को मिलती है। भगवान विष्णु के मंदिर न केवल भारत मेंं बल्कि पूरे विश्वभर में स्थापित है। तो आईए जानें कंबोडिया में विष्णु भगवान को समर्पित मंदिर के बारे में।

कंबोडिया में अंकोरवाट के नाम का यह मंदिर परिसर दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है माना जाता है। यह मूल रूप से खमेर साम्राज्य के लिए भगवान विष्णु के  हिंदू मंदिर के रूप में बनाया गया था, जो धीरे-धीरे 12 वीं शताब्दी के अंत में बौद्ध मंदिर में परिवर्तित हो गया। यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम 'यशोधरपुर' था। इस मंदिर का निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय के शासनकाल में हुआ था। यह मंदिर पूर्व भगवान विष्णु को समर्पित था, बल्कि बाद में पूर्ववर्ती शासकों ने प्रायः यहां शिवमंदिरों का निर्माण किया था। मिकांक नदी के किनारे सिमरिप शहर में बना यह मंदिर आज भी संसार का सबस बड़ा हिंदू मंदिर माना जाता है, जो सैकड़ों वर्ग मील में फैला हुआ है। यह मंदिर मेरु पर्वत का भी प्रतीक है। मंदिर की दीवारों पर भारतीय धर्म ग्रंथों को प्रसंगों का चित्रण है। इन चित्रों में अप्सराएं बहुत सुंदर चित्रित की गई हैं और असुरों व देवताओं के बीच समुद्र मंथन का दृश्य भी बहुत सुदंरता से पेश किया गया है।


इतिहास

यह मंदिर विश्वभक के लोकप्रिय पर्यटन स्थानों में से एक होने के साथ-साथ यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से एक है। सनातनी इसे एक पवित्र तीर्थस्थान का दर्जा देते हैं। इस मंदिर की तस्वीर कंबोडिया के राष्ट्रीय ध्वज पर भी है। साथ ही इस मंदिर का नाम गिनीज बुक आॅफ रिकार्ड में भी दर्जा है। इस मंदिर को देखने और भगवान विष्णु के दर्शन करने के लिए लाखों भक्त भारत समेत हर वर्ष यहां पहुंचते है। पर्यटक यहां न केवल वास्तुशास्त्र का अनुपम सौंदर्य का लुफ्त उठाने आते है बल्कि यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त देखने भी आते हैं। बताया जाता है कि इस मंदिर क बनावाने के लिए पचास से एक करोड़ रेत के पत्थर का इस्तेमाल किया गया और प्रत्येत पत्थर का वजन डेढ़ टन है। 


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