‘एकल नारी शक्ति संगठन’:पावर ऑफ सिंगल वुमन

‘हिमाचल के जिला मंडी की बर्फीली पहाड़ियों में मेरा जन्म हुआ। ठंडी हवा की गुदगुदाहट, रंग-बिरंगे फूलों के बीच खुशहाल जिंदगी बीत ही रही थी कि एक दिन ये लड़कपन छूट गया। 24 साल की उम्र में शादी हो गई। ‘देव भूमि’ में पतिदेव से मिलन हुआ। लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि इस ‘निर्मल चंदेल’ की जिंदगी से निर्मलता इतनी जल्दी चली जाएगी। अभी-अभी तो पति की बाहों में प्रेम के हिलोरे मारना शुरू ही किया था कि 27 साल की उम्र में विधवा हो गई। भास्कर वुमन से खुलकर हुई बातचीत में उन्होंने बताया, ‘वही जेठ-जिठानी जो कभी लाड़-लड़ाते थे, कुल्टा, जन्मजलि-करमजली कहने लगे। जब घर वालों ने यह सब बोलना शुरू किया तो बाहर वालों का मुंह मैं कैसे पकड़ती? मैं दुनिया के लिए पति को खा जाने वाली डायन बन गई थी। मुझे रंग बहुत पसंद हैं, लेकिन पति के जाते ही मेरे जीवन के सारे रंग भी उड़ गए। ‘आज 2021 में जिंदगी अलग नजर आती है, लेकिन 1989 में लड़की का विधवा होना श्राप था। गांव के रीति-रिवाज के मुताबिक, 4 साल तक घर में ही रहना था, लेकिन घुटन बर्दाश्त नहीं हो रही थी। गाय-भैंस का चारा, गोबर को उठाकर घूरे तक फेंककर आना, घर के सब काम करती, लेकिन अपने ही ससुराल में सम्मान की जिंदगी नहीं मिली। एक साल बाद सोचा कि घर से बाहर निकलूं। लेकिन बंदिशें इतनी थीं कि काम के बहाने ही बाहर जा सकती थी। जब आंगनबाड़ी के फॉर्म आए तो मुझे किसी ने जानकारी दी और मैं गोबर फेंकने के बहाने गांव के प्रधान से जाकर मिली व नौकरी की इच्छा जताई। इस तरह मैं हर छोटी नौकरी के लिए हाथ-पैर मारती रहती।
सुतरा संस्था की कार्यकर्ता हमारे गांव में महिला संगठन बनाने आई। गांव की महिलाएं मेरे नौकरी के प्रयासों को देख चुकी थीं इसलिए उन्होंने कार्यकर्ता से मुझे नौकरी देने की सिफारिश की। चूंकि मेरे पास गांव की महिलाओं का साथ था, इसलिए मुझे नौकरी भी मिल गई। ‘सुतरा’ में मुझे अकाउंट संभालने का काम मिल गया। चपरासी का काम सोचकर आई थी, लेकिन इतनी बड़ी पोस्ट मिल गई कि लगा मुझमें सुर्खाब के पर लग गए हों। एक मैट्रिक पास को इतनी बड़ी पोस्ट मिलना किसी सपने के सच होने के बराबर था। गोबर उठाने वाली मुझ जैसी महिला किसी संस्था का अकाउंट 15 साल तक संभाल लेगी ये मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।काम की शुरुआत में कैश बुक से लेकर सब कुछ हाथ से ही लिखती थी। फिर किसी ने कहा कंप्यूटर सीख लो। चूल्हे में आग जलाना आसान लगता था, लेकिन कंप्यूटर पर काम करने के नाम पर डर लगने लगता। कहीं कुछ गलत टाइप कर गई, तो क्या होगा? जितने आत्मविश्वास के साथ ये हाथ चूल्हा जला लेते थे, उतनी ही सादगी से अब कंप्यूटर भी चला लेते हैं।
फोटोस्टेट मशीन, स्कैन मशीन और प्रिंटर जैसी चीजों के बारे में कुछ नहीं जानती थी, लेकिन काम करते-करते इन सभी से दोस्ती हो गई। मशीनें थीं समझ में आ गईं, लेकिन इंग्लिश में लिखे वाउचर, चेक, ड्राफ्ट समझ नहीं आते थे। काम रुके नहीं इसलिए वाउचर के पीछे पेंसिल से हिंदी में लिखती कि ये वाउचर किस काम के लिए है।
एक दिन काम से छुट्टी पर घर जा रही थी, तभी बिलासपुर बस स्टैंड के पास किताब बेचने वाला आया। उससे मैंने अंग्रेजी का कायदा खरीदा। उस कायदे से मैंने फल-सब्जियों के नाम और गिनतियां सीखीं। उसमें ध्यान से स्पेलिंग देखती, ताकि चेक में गलती न हो। धीरे-धीरे अकाउंट की भाषा सीख गई। मुझे कोई बच्चा नहीं था, इसलिए लगता था कि किसके लिए कमाऊं? अब नौकरी छोड़ देती हूं, लेकिन मेरे बॉस ने मुझमें विश्वास जताया और मुझे नौकरी नहीं छोड़ने दी। बैंक की किताबों से डेबिट, क्रेडिट, कैश इन हैंड, ओपनिंग बैलेंस, बैलेंस शीट, अकाउंट स्टेटमेंट जैसे शब्द सीखे। यही नहीं, ‘पहले लिख, फिर दे, भूल पड़ी तो कागज से ले।’ ये लाइन भी वहीं से सीखी। इस सीख ने काम में कभी कोई गलती होने नहीं दी।2005 में उदयपुर से एकल महिलाओं के सम्मेलन की जानकारी मिली। उस सम्मेलन में मैं भी गई थी। एकल महिलाओं की शिकायत थी कि पंचायत से लेकर घर वाले भी हमारी बात नहीं सुनते। सिर्फ 25 रुपए की पेंशन से हमारा गुजारा नहीं होता। यही नहीं, जिन महिलाओं के बच्चे थे, उन्हें तो घर चलाना और भी मुश्किल था। इस सम्मेलन में मुझे समझ आया कि सिंगल वुमन वाली परेशानियां मुझ अकेली की नहीं हैं, मुझ जैसी कई हैं जो इस परेशानी से गुजर रही हैं और तब मैंने एकल महिलाओं का संगठन बनाने का फैसला किया। 2013 में 'एकल नारी शक्ति संगठन' का रजिस्ट्रेशन कराया। राष्ट्रीय स्तर पर एक और संगठन ‘राष्ट्रीय एकल नारी अधिकार मंच’ भी बनाया। आज मैं इस संस्था की प्रेजिडेंट हूं और एकल नारी शक्ति संगठन की स्टेट कॉर्डिनेटर भी हूं।
हिमाचल में महिलाओं को संगठन बनाने के लिए जमा करना मुश्किल था। जब महिलाओं को जमा कर रही थी, तब गांव के लोग महिलाओं को भड़काते कि इस संस्था से मत जुड़ो। ये तुम्हे बेंच देंगे। तुम्हारे बच्चे रोएंगे, लेकिन कुछ महिलाओं ने मुझ पर विश्वास किया और साथ आईं। उनकी बदौलत ये संगठन खड़ा हुआ। हिमाचल में रहकर विडो वुमन के लिए पेंशन और जमीन जैसे मुद्दों पर काम किया। हमारी कोशिशों ने असर भी दिखाया। महिलाओं के अधिकारों के लिए पदयात्रा निकाली। हमें लोगों ने भड़काने की कोशिश की और आंदोलन को खत्म करने की तमाम कोशिशें भी की गईं, पर हम औरतें थीं, हार नहीं मानी। एकल महिलाओं के नाम जमीन, पेंशन में वृद्धि और मुफ्त इलाज की मांगें पूरी करवाईं।  सोशल मीडिया पर अपने काम को प्रमोट करना सीखा। यहीं से एकल और विधवा महिलाओं के लिए पिटीशन डाली, उस पर लोगों का अच्छा रिस्पॉन्स आया। फिर महिला संगठनों के साथ मिलकर कई ट्रेनिंग प्रोग्राम्स का हिस्सा बनी।वो लड़की जो कभी घर से बाहर निकलने पर भी घबराती थी आज तमाम देशों में हवाई जहाज से सैर कर रही है। 56 साल की उम्र में पहुंचकर लाइफ में बेफिक्री आई है। आज मेरा संगठन हिमाचल प्रदेश के 7 जिलों में काम कर रहा है। आज 16,258 महिलाएं मेरे संगठन से जुड़ी हैं। एकल महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व समान भागीदारी के लिए काम करती हूं। मैं आज भी महिलाओं से कहती हूं कि ‘जागो बहनों डरना छोड़ो, हिम्मत से काम करो।’ एक समय था जब मैं आत्महत्या करने का भी सोचती थी, अगर गलत कदम उठा लेती तो आज इतनी महिलाओं की मदद नहीं कर पाती। अब भी बहुत कुछ सीखना बाकी है। अब मुझे लगता है कि महिलाओं को डरना नहीं चाहिए। वक्त हमेशा एक-सा नहीं रहता। कुछ नया सीखते रहना चाहिए और अच्छे मौके हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। सफल जीवन की यही कुंजी है।

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