जस्टिस लोया: महाराष्ट्र सरकार ने जांच की मांग का किया विरोध

नई दिल्ली । महाराष्ट्र सरकार ने शुक्रवार को मुंबई के विशेष जज बीएच लोया की मौत की जांच की मांग करने वाली याचिकाओं का विरोध किया और याचिकाओं को दुर्भावना से प्रेरित बताया। राज्य सरकार ने कहा कि चार साथी जजों के बयान देखने के बाद इस मामले में किसी तरह की जांच की जरूरत नहीं रह जाती है।
ये दलीलें महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने जज लोया की मौत की जांच मांग पर चल रही सुनवाई के दौरान दीं। कांग्रेस के नेता तहसीन पूनावाला व महाराष्ट्र के एक पत्रकार बीआर लोन ने सुप्रीम कोर्ट मे जनहित याचिकाएं दाखिल कर जज लोया की मौत की कोर्ट की निगरानी में एसआइटी से जांच कराने की मांग की है। इसके अलावा बाम्बे लायर्स एसोसिएशन की याचिका और कुछ हस्तक्षेप अर्जियों में भी यही मांग की गई है।
शुक्रवार को एक हस्तक्षेप अर्जीकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील इंद्रा जयसिंह बहस कर रहीं थीं। जयसिंह ने जज लोया की मौत के मामले में राज्य सरकार द्वारा दाखिल किये गए जांच व अन्य दस्तावेजों पर सवाल उठाए। यहां तक कि दस्तावेजों में शुरुआत में जज लोया का नाम और उनकी मृत्यु की तिथि भी गलत दर्ज किये जाने और बाद में उसे ठीक किये जाने की बात कही। इसी दौरान जब जयसिंह ने कहा कि जज लोया सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इस मामले को जब सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात से मुंबई ट्रांसफर किया था तो आदेश दिया था कि ट्रायल के दौरान जज नहीं बदले जाएंगे लेकिन इसके बावजूद बाम्बे हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई कर रहे जज का स्थानांतरण कर दिया। इस पर महाराष्ट्र सरकार की ओर मौजूद मुकुल रोहतगी ने जबरदस्त विरोध किया।
रोहतगी ने कहा कि बहस करने से पहले याचिकाकर्ता के वकील ने ठीक से होमवर्क भी नहीं किया है जो समझ आ रहा है एक घंटे से बोलती जा रहीं है। इस मामले में जज का ट्रांसफर 2014 में हुआ था जबकि मामले का ट्रायल अभी छह महीने पहले ही शुरू हुआ है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि ट्रायल के दौरान जज का ट्रांसफर नहीं होना चाहिए और ट्रायल के दौरान जज का ट्रांसफर नहीं हुआ है। इन्होंने तथ्यों को सही से नहीं देखा है और कोर्ट में बहस कर रही हैं। रोहतगी ने कहा कि जांच की मांग करने वाली जनहित याचिकाएं दुर्भावना से प्रेरित ये पीत पत्रकारिता है। उन्होंने कहा कि मामले में चार साथी जजों के दिये गये बयान देखने के बाद किसी जांच की जरूरत नहीं रह जाती।
