यमराज पर भारी पड़ गई एक नारी, बनीं सौ पुत्रों की माता

वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है। यह व्रत पति की दीर्घायु और संतान प्राप्ति की कामना के लिए महत्वपूर्ण है। व्रत से जुड़ी सावित्री की कथा में बताया गया है कि यदि एक स्त्री धैर्य और बुद्धिमानी के साथ कठिन परिस्थिति का सामना करे तो यमराज को भी उसके आगे हार माननी पड़ जाती है। देखिए सावित्री की चतुरता ने न केवल उसके पति के प्राण वापस लौटाए बल्कि उन्हें 100 पुत्रों की मां भी बनाया…
यौवनावस्था को प्राप्त कर लेने के पश्चात सावित्री के पिता मद्र देश के राजा अश्वपति अपनी पुत्री से कहा कि तुम अत्यंत विदुषी हो और अपने पति की खोज तुम अपने अनुसार स्वयं ही कर लो।
पिता की आज्ञा के साथ ही सावित्री एक बुद्धिमान मंत्री को साथ लेकर पति की खोज पर निकल पड़ीं। काफी खोजबीन के बाद उन्हें सत्यवान के रूप में एक योग्य वर मिला। सावित्री ने लौटकर अपने पिता को सत्यवान के बारे में बताया तो वहां मौजूद देवर्षि नारद कहने लगे कि सावित्री ने अपने पति का सही चुनाव नहीं किया। उन्होंने जिस सत्यवान को पति के रूप में चुना है, उसकी आयु अब मात्र एक वर्ष ही शेष है।
नारद जी के वचन सुनकर भी सावित्री बोलीं- ‘भारतीय नारी जीवन में केवल एक बार ही अपना पति चुनती है। इसलिए मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी।’ विवाह के पश्चात सावित्री अपने राजसी ठाठ-बाठ छोड़कर अपने पति और सास-ससुर के साथ वन में जीवन व्यतीत करने लगीं। सत्यवान के पिता शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन का राजपाट उनके पड़ोसी राजा ने छीन लिया था। तब से वह अपने पुत्र के साथ वन में रह रहे थे।
सावित्री जैसे-जैसे अपने वैवाहिक जीवन में रम रही थीं, वैसे-वैसे उनका भय भी बढ़ता जा रहा था कि वह दिन करीब आने वाला है जब सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी। उस दिन के आते ही सावित्री साया बनकर अपने पति के साथ रहने लगी। वन में लकड़ी काटने के लिए सत्यवान जैसे ही पेड़ पर चढ़े वह अस्वथ होकर जमीन पर गिर पड़े। सावित्री ने उन्हें संभाला और उनका सिर अपनी गोद में रखकर लिटा लिया। कुछ समय बाद सत्यवान अचेत हो गए। सावित्री सब कुछ समझ चुकी थीं।
सावित्री अपने पति की मृत्यु का विलाप कर ही रही थीं कि थोड़ी देर में यमराज प्रकट हो गए। यमराज सत्यवान को अपने साथ लेकर दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दीं। सावित्री को अपने पीछे आते देख यमराज ने उनसे कहा, ‘तू मेरे पीछे मत आ क्योंकि तेरे पति की आयु पूर्ण हो चुकी है और वह अब तुझे वापस नहीं मिल सकता। अब तू लौट कर अपने पति के मृत शरीर की अन्त्येष्टि कर।’ सावित्री ने उत्तर दिया, ‘मैं आपके तो क्या अपने पतिव्रता धर्म को निभाने के लिए किसी भी लोक तक जा सकती हूं।’
सावित्री के पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने उनसे एक वर मांगने को कहा। सावित्री ने वर में अपने नेत्रविहीन ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी। यमराज ने कहा, तथास्तु। फिर से सावित्री ने कहा, ‘मुझे आप जैसे महान देवता के दर्शन हुए, मैं धन्य हो गई।’ सावित्री की इन बातों से यमराज ने फिर से प्रसन्न होकर एक वर मांगने को कहा। इस बार सावित्री ने अपने ससुर को उनका राज्य वापस मिलने का वर मांग लिया। यह सिलसिला चलता रहा और सावित्री की बातों से यमराज प्रसन्न होते रहे और सावित्री एक के बाद एक वर मांगती गईं।
जब यमराज ने सावित्री से अंतिम वर मांगने को कहा तो सावित्री बोलीं, मुझे अपने ससुर द्युमत्सेन के कुल की वृद्धि के लिए 100 पुत्र प्राप्त करने का वरदान दें। यमराज फिर से तथास्तु बोलकर चल दिए। सावित्री भी पीछे-पीछे चल दी। सावित्री को फिर से पीछे आता देख यमराज ने कहा, मेरा कहना मान और अब तू वापस चली जा। इस पर सावित्री बोलीं, आपने जो मुझे 100 पुत्र प्राप्त करने का वरदान दिया है। यदि मेरे पति का अंतिम संस्कार हो गया तो मैं 100 पुत्रों को कैसे जन्म दूंगी। सावित्री की इस चतुरता के आगे यमराज को हार माननी पड़ी। यमराज ने सत्यवान को जीवनदान दिया और इस प्रकार सावित्री ने आगे चलकर 100 पुत्रों को जन्म दिया।
