पूर्णिमा पर अस्वस्थ होने के बाद भगवान जगन्नाथ, मौसी के घर करने जाएंगे विश्राम

चार धामों में से एक ओड़िसा के प्रसिद्ध तीर्थस्थल जगन्नाथ पुरी में जिस तरह रथयात्रा की धूम रहती है और रथयात्रा के दौरान जिन रस्मों का पालन किया जाता है, ठीक वैसी ही रस्में राजधानी रायपुर के चार बड़े मंदिरों में भी निभाई जाती हैं। ऐसी ही रस्मों में से एक रस्म भगवान जगन्नाथ के बीमार पड़ने और 15 दिन तक मंदिर के पट बंद रखने की है। साथ ही पट बंद रहने के दौरान भगवान का इलाज करने के लिए औषधियुक्त काढ़ा पिलाने की रस्म भी शामिल है।
28 को कराया जाएगा भगवान को स्नान –
राजधानी के गायत्री नगर, सदरबाजार, पुरानी बस्ती टुरी हटरी, लिली चौक, गुढ़ियारी, आमापारा स्थित जगन्नाथ मंदिरों में 28 जून को ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ को पवित्र नदियों के जल से स्नान करने की परंपरा निभाई जाएगी। मान्यता है कि अत्यधिक स्नान करने से भगवान अस्वस्थ हो गए थे। भगवान को स्वस्थ करने के लिए औषधि का काढ़ा पिलाया जाएगा।
भगवान की खैर-खबर लेने का पुण्य हजार गुणा –
सदरबाजार स्थित जगन्नाथ मंदिर के सेवादार पुजारी परिवार के सदस्य बताते हैं कि जब 15 दिनों तक मंदिर के पट बंद रहते हैं तब भक्त भगवान का दर्शन नहीं कर पाते। मंदिर के बाहर से ही मत्था टेककर लौट जाते हैं। इस दौरान जो भक्त भगवान की खैर-खबर (हालचाल) लेने मंदिर के बाहर पहुंचते हैं उन्हें दर्शन करने से हजार गुणा ज्यादा पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
औषधियुक्त काढ़ा का प्रसाद लेने से भक्त रहेंगे निरोगी –
कई तरह की औषधि के मिश्रण से बनाए गए काढ़े का भोग भगवान को लगाने के बाद इसे भक्तों में बांटा जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त भक्तिभाव से काढ़ा रूपी प्रसाद को ग्रहण करता है वह सालभर तक निरोगी रहता है।
तीन से पांच दिन पिलाएंगे काढ़ा –
किसी मंदिर में तीन तो किसी मंदिर में पांच दिन तक भगवान को काढ़ा पिलाने की रस्म निभाई जाएगी। एकादशी तिथि के दिन पिलाई जाने वाली औषधि का प्रसाद लेने मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
14 को भक्तों को दर्शन देने मंदिर से बाहर आएंगे –
15 दिन के बाद जब मंदिर के पट खोले जाएंगे तब दो दिवसीय उत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। 12 जुलाई को नेत्रोत्सव पर भगवान का श्रृंगार किया जाएगा। दूसरे दिन 14 जुलाई को भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को साथ लेकर अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए मंदिर से बाहर आएंगे। तीन अलग-अलग रथ पर सवार होकर वे मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) जाएंगे। 10 दिनों बाद भगवान पुनः देवशयनी एकादशी पर मंदिर लौटेंगे।
