बिना कामुकता के प्रेम करना सीखना है तो इनसे सीखें

भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र अत्यंत दिव्य है। हर कोई उनकी ओर खिंचा चला जाता है। उनके जीवन की प्रत्येक लीला में विलक्षणता दिखाई देती है। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव सामाजिक समता का एक उदाहरण है। श्रीकृष्ण ने कारागार में जन्म लिया और गांव में खेलते हुए उनका बचपन व्यतीत हुआ। इस प्रकार श्रीकृष्ण का चरित्र कई तरह के भावों को जोड़ता है।


संबंधों और व्यवहारों की दृष्टि से और देश, काल, पात्र, अवस्था, अधिकार आदि भेदों से जितने भिन्न-भिन्न धर्म अथवा कर्तव्य हुआ करते हैं, सबमें कृष्ण ने अपने विचार, व्यवहार और आचरण से एक सद्गुरु की भांति पथ प्रदर्शन किया है। कृष्ण और बांसुरी की इतनी अभिन्नता है कि उनके नाम के पहले बंसी का नाम जुड़ा है। जहां मुरली है वहां मुरलीधर हैं। यह बंसी उनकी संगिनी है, सहचरी है। इस संसार में एक हाथ में बांसुरी और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर इतिहास रचने वाला कोई अन्य व्यक्तित्व नहीं हुआ। कृष्ण के चरित्र में कहीं किसी प्रकार का निषेध नहीं है। जीवन के प्रत्येक पल को, प्रत्येक पदार्थ को, प्रत्येक घटना को समग्रता के साथ स्वीकार करने का भाव है।


कहां तो यमुनातट पर मुरली के मधुरनाद से ब्रज बालाओं को आकुल करना और कहां पांचजन्य-शंख के निनाद से युद्धक्षेत्र प्रकंपित करना। मुरली से जहां उन्होंने धरती के सोए हुए भाव जगाए, वहीं कौमोदकी गदा के भीषण प्रहार से, शारंग धनुष के बाणों के आघात से, धूमकेतु के समान कृपाण से और अनंत शक्तिशाली सुदर्शन चक्र से भारतभूमि को अत्याचारी, अधर्मी व लोलुप राजाओं से विहीन कर दिया।


अतुल नेतृत्व-शक्ति रखते हुए भी दूत और सारथी का काम किया और युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में अग्रपूजा के योग्य माने जाने पर भी जूठी पत्तलें उठाने का कार्य किया। चरित्र की ऐसी विलक्षणता और कहीं देखने को नहीं मिलती। वे प्रेम करते हैं तो पूर्ण रूप से उसमें डूब जाते हैं। मित्रता करते हैं तो उसमें भी पूर्ण निष्ठावान रहते हैं। जब युद्ध स्वीकार करते हैं तो उसमें भी पूर्ण स्वीकृति होती है।


कृष्ण गोपियों के प्रेम में आसक्त दिखाई देते तो हैं, किंतु उनका वह आकर्षण भी उन्हें उनके कर्तव्य से विमुख नहीं कर पाता। इस प्रकार कृष्ण और गोपियों का प्रेम-प्रसंग कामुकता का खंडन करके लोकहित की भावना का समर्थन करता है। कृष्ण एक ओर जहां महान योगी थे तो दूसरी ओर ऋषि भी थे। जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसे उन्होंने अपनी प्रतिभा से प्रभावित नहीं किया। सर्वत्र उनकी अद्‌भुत मेधा तथा प्रतिभा के दर्शन होते हैं। एक ओर वे महान राजनीतिज्ञ, धर्म पर आधारित नवीन साम्राज्य के सृष्टा राष्ट्रनायक के रूप में दिखाई पड़ते हैं तो दूसरी ओर धर्म, अध्यात्म, दर्शन तथा नीति के सूक्ष्म चिंतक, विवेचक तथा प्रचारक के रूप में भी उनकी भूमिका कम महत्व की नहीं है।


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