पिता की शादी कराने के लिए आजीवन कुंवारे रह गए, हुआ खुद का ऐसा अंजाम

महाभारत के महायोद्धाओं में प्रमुख भीष्म पितामह देवी गंगा और राजा शांतनु के पुत्र थे। स्वर्गलोक में ब्रह्मा जी द्वारा दिए गए एक शाप के कारण देवी गंगा और शांतनु को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा था। इनकी आठवीं संतान थे देवव्रत, जो आगे चलकर भीष्म और फिर भीष्म से भीष्म पितामह बने। भीष्म पितामह आजीवन कुंवारे रहे। इनके ब्रह्मचर्य का कारण अपने पिता का विवाह कराने के लिए ली गई प्रतिज्ञा थी…
जब भीष्म का जन्म हुआ तो उनकी माता गंगा उन्हें अपने साथ लेकर स्वर्गलोक लौट गईं। गंगा ने अपने इस पुत्र का नाम देवव्रत रखा था। देवव्रत के जन्म के बाद गंगा को शाप से मुक्ति मिल गई थी। लेकिन राजा शांतनु को अभी पृथ्वी पर ही रहना था। स्वर्ग में गंगा ने अपने पुत्र को देवताओं और देवऋषियों से शिक्षा-दीक्षा दिलाई।
गंगा के जाने के बाद राजा शांतनु ने दूसरा विवाह नहीं किया। बल्कि गंगा और अपने पुत्र के लौटने की प्रतीक्षा करते रहे। फिर 16 साल बाद एक दिन गंगा प्रकट हुईं और उनके साथ राजकुमार देवव्रत भी थे। देवव्रत को उनके पिता शांतनु को सौंपकर गंगा फिर से स्वर्गलोक को लौट गईं।
एक दिन अपने पुत्र देवव्रत को लेकर राजा शांतनु शिकार पर गए। वहां शिकार करते-करते शांतनु अपने पड़ाव से काफी आगे निकल गए और देवव्रत पड़ाव पर ही रुके हुए थे। शांतनु ने रास्ते में एक जगह यमुना किनारे नाव के साथ एक अत्यंत सुंदर स्त्री को देखा, जिस देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गए। उस स्त्री का नाम सत्यवती था, जो स्वर्ग की अप्सरा थीं लेकिन एक शाप के कारण पृथ्वी पर जन्मीं थी। राजा शांतनु ने सत्यवती के सामने विवाह प्रस्ताव रखा तो उन्होंने शांतनु से कहा कि विवाह के संबंध में आप मेरे पिता से बात करिए।
राजा शांतनु अपने और सत्यवती के विवाह का प्रस्ताव लेकर उनके घर उनके पिता से मिलने पहुंचे। उनके पिता ने शांतनु के सामने शर्त रख दी कि वह अपनी पुत्री का विवाह शांतनु के साथ तभी कर सकते हैं, जब वह यह वचन दें की सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का युवराज बनेगा। शांतनु यह वचन नहीं दे सकते थे क्योंकि शांतनु अपने पुत्र देवव्रत को युवराज घोषित कर चुके थे। जब शांतनु इस शर्त को मानने के लिए तैयार नहीं हुए तो सत्यवती के पिता ने इस विवाह से इंकार कर दिया।
शांतनु ने अपने दिल की बात किसी को नहीं बताई और खोए-खोए रहने लगे। वह हर रोज यमुना के उसी किनारे पर जाते जहां सत्यवती बैठती थी और फिर पेड़ के पीछे छिपकर सत्यवती को निहारते रहते। अपने पिता को उदास देखकर देवव्रत ने पता लगाया कि आखिर पिता की उदासी का कारण क्या है। देवव्रत ने शांतनु के सारथी से उनके बारे में जानकारी ली और फिर सारथी को लेकर सत्यवती के घर पहुंचे। देवव्रत ने सत्यवती का हाथ उनके पिता से मांगा ताकि वह सत्यवती का विवाह अपने पिता के साथ करा सकें।
देवव्रत ने जब सत्यवती के पिता से उनका हाथ मांगा तो उन्होंने वही बात दोहरा दी, जो उन्होंने राजा शांतनु से कही थी। इस पर देवव्रत ने कहा कि पिता आपको यह वचन नहीं दे सकते थे क्योंकि वह मुझे युवराज घोषित कर चुके हैं। लेकिन युवराज होकर मैं आपको यह वचन दे सकता हूं कि मैं इस राज्य की कमान अपने हाथ में नहीं लूंगा और देवी सत्यवती का पुत्र ही युवराज बनेगा। इस पर सत्यवती के पिता कहा कि युवराज तुम भी यह वचन अपनी तरफ से दे सकते हो लेकिन तुम्हारी संतान की तरफ से यह वचन देने के अधिकारी नहीं हो कि वह आगे चलकर सिंहासन पर अपना अधिकार नहीं जताएगी। तब भीष्म ने प्रतिज्ञा की कि वह आजीवन कुंवारे ही रहेंगे। न उनकी संतान होगी और न ही सिंहासन को लेकर कोई विवाद उपजेगा।
सत्यवती के पिता निषादराज के सामने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा लेकर देवव्रत सत्यवती को अपने साथ लेकर अपने पड़ाव पर लौट आए। जब राजा शांतनु को अपने पुत्र की इस प्रतिज्ञा के बारे में पता चला तो वह बहुत व्यथित हुए। इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उन्होंने अपने बेटे को भीष्म कहा। फिर सत्यवती और शांतनु अपने पुत्र देवव्रत को भीष्म कहकर ही पुकारने लगे। तभी शांतनु ने अपने पुत्र भीष्म को यह वरदान दिया कि वह जब तक चाहेंगे जीवित रहेंगे। उन पर मृत्यु का कोई वश नहीं होगा और वह अपनी इच्छा से ही मृत्यु को प्राप्त होंगे। इस तरह गंगा और शांतनु के पुत्र देवव्रत से भीष्म कहलाए। पिता से प्राप्त वरदान के कारण भीष्म को महाभारत के महायुद्ध में बाणों की शैय्या पर लेटना पड़ा और पौत्र के हाथों वीरगति प्राप्त हुई।
