भादवा माता के दरबार में मत्था टेकते ही शारीरिक कष्टों से मिल जाता है छुटकारा

नवरात्र के अवसर पर माता के दरबार में भक्तों का मेला लगता है। मां के आंगन में भक्त मुरादें लेकर आते हैं और आशीषों की झोली भरकर खुशी-खुशी लौट जाते हैं। मां अपनी दहलीज पर आए भक्तों को कभी निराश नहीं करती है। माता के मंदिर में आए भक्तों के लिए सुखों की सौगात बरसाती रहती है।
वैसे तो मातारानी के मंदिरों में सालभर भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है, लेकिन नवरात्र में मां की विशेष कृपा अपने भक्तों पर रहती है इसलिए माता मंदिरों में शीश नवाने विशेष तौर पर भक्त आते हैं और मां का आशीर्वाद पाने के लिए घंटों कतार में खड़े रहते हैं।
माता का एक ऐसा ही सिद्धक्षेत्र मालवा का भादवामाता धाम है, जहां लोगों को सुख-समृद्धि के साथ शारीरिक कष्टों से विशेष तौर पर छुटकारा मिलता है। मान्यता है कि मां भादवा के आंगन में आने से लाचार और अशक्त भी चुस्त-दुरुस्त होकर अपने पैरों पर खड़े होकर घर वापस जाते हैं भादवामाता के इस मंदिर को आरोग्यतीर्थ के नाम से भी जाना जाता है।
मां के आंचल से भक्तों के लिए हमेशा प्यार बरसता है। श्रद्धा और भक्ति से एक पल के लिए भी यदि मां का ध्यान किया जाए तो जन्म-जन्मान्तर के पापों का क्षमण होकर जीवन सहज-सरल हो जाता है। देश और विदेश में माता के कई मंदिर है कुछ बहुत प्राचीन और पौराणिक हैं तो कुछ नए लेकिन शास्त्रोक्त तरीके से भव्य स्वरूप में बनाए गए हैं। देवी के कई रूप धरती पर विराजमान है, जो भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करते हैं।
देवी का एक ऐसा ही स्वरूप मध्य प्रदेश के मालवा में नीमच शहर के नजदीक स्थित है, जिनको भादवा माता के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि मां भादवा के आंगन में आने से लाचार और अशक्त भी चुस्त-दुरुस्त होकर अपने पैरों पर खड़े होकर घर वापस जाते हैं. इसलिए माता के इस तीर्थ को आरोग्य तीर्थ भी कहा जाता है।
पौराणिक काल से हैं माता का बसेरा
मां भादवा का मंदिर काफी प्राचीन है और मंदिर के गर्भगृह में माता की मूर्ति चांदी के सिहासन पर विराजमान है। माता की मूर्ति के सामने चमत्कारिक ज्योति जलती रहती है। यह ज्योति कई वर्षों से बिना रुके लगातार जल रही है। ऐसा माना जाता है कि भादवा माता रोज मंदिरों का फेरा लगाती हैं।
वह अपने भक्तों को आशीर्वाद देकर निरोगी बनाती हैं, इसलिए दूर-दूर से माँ के भक्त मंदिर के सामने ही विश्राम कर रात गुजारते हैं। लोगों का ऐसा विश्वास है कि माता के आशीर्वाद से लकवा, नेत्रहीनता, कोढ़ आदि से ग्रस्त रोगी निरोगी होकर घर जाते हैं।
मॉ के आसन के साथ माता नवशक्तियों की नौ प्रतिमाऐं विराजित हैं। माता भगवती के इन रुपों को ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवद्ती और चामुण्डा कहा जाता है।
चमत्कारी जल से भरी है बावड़ी
मंदिर की स्थापना के समय से यहाँ एक प्राचीन बावड़ी है। ऐसा कहा जाता है कि माता ने अपने भक्तों को निरोगी बनाने के लिए जमीन से यह जल निकाला था और कहा था कि मेरी इस बावड़ी के जल से जो भी स्नान करेगा, वह व्यक्ति रोगमुक्त हो जाएगा। मंदिर परिसर में स्थित बावड़ी का जल अमृत तुल्य है। माता की इस बावड़ी के चमत्कारी जल से स्नान करने पर समस्त शारीरिक व्याधियाँ दूर होती हैं।
हजार साल पुराना है माता मंदिर का इतिहास
पुरातात्विक के आधार पर पता चलता है कि आठवीं शताब्दी से लेकर ग्यारवीं शताब्दी तक यहां एक विकसित स्थल रहा है। संभवत: परमार नरेशों के शासन काल में भादवा माता की अष्टभुजा महासरस्वती के रुप में प्राण-प्रतिष्ठा हुई है। मां भगवती की मुख्य प्रतिमा संभवत: 10 वीं 11 वीं शताब्दी की ही प्रतीत होती है। भादवा माता का वर्तमान रुप में अवतरण मेवाड़ के महाराणा रायमल के शासन काल में संवत 1532 में माना जाता है, जबकि देवी के पुजारी भीलों के भाट की पोथी में अंकित विवरणानुसार गांव की बसाहट बाधा रावल के समय संवत 791 वर्ष की मानी गई है ।
जबकि कुछ जगहों पर इस बात का भी विवरण मिलता है कि वर्तमान रूप में प्राकट्य मेवाड़ के महाराणा मोकल के शासन काल में संवत 1482 में हुआ था। देवी के पुजारी स्थानीय भील हैं और वंशानुवंश यहां पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं।
पहले जब यहां कच्ची बावड़ी थी तब इसका जीर्णोध्दार समीप के गांव के एक परिवार से करवाया था। चमत्कारी जल वाली यह बावड़ी शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। ग्वालियर स्टेट गजेटियर के अनुसार सिंधिया ने जब सन् 1768 ई. में नीमच का यह क्षेत्र मेवाड़ राज्य से गिरवी रखा तो ग्राम भादवा भी ग्वालियर राज्य का अंग बन गया।
रविवार को माता का विशेष आराधना दिवस माना जाता है। इसके साथ ही यहां वर्ष में दो बार चैत्र व अश्विन नवरात्र के पुण्य पर्वों पर विशेष मेला लगता है। इस दौरान यहां देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु मंदिर के दर्शन के साथ स्वास्थ्य लाभ लेने और मनवांछित मुरादे पाने आते हैं।
