भीमा कोरेगांव बरसी: क्या थी वह लड़ाई जिसमें 800 महारों ने 28000 मराठाओं को हराया

भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा को एक साल पूरा हो चुका है. महाराष्ट्र के पुणे के भीमा कोरेगांव में हुए युद्ध की 200वीं सालगिरह के दौरान वहां हिंसा भड़क गई थी. इसका असर महाराष्ट्र के कई शहरों में पड़ा था. आइए जानते हैं क्या थी भीमा कोरेगांव में लड़ी गई 200 साल पुरानी लड़ाई जिसमें 800 महारों ने 28 हजार मराठाओं को हरा दिया था?

क्या थी भीमा-कोरेगांव में युद्ध की वजह?
जनवरी 1818 को भीमा-कोरेगांव में अंग्रेजों की सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28000 सैनिकों को हराया था. ब्रिटिश सेना के अधिकतर जवान महार समुदाय के थे. कुछ इतिहासकारों के हिसाब से उनकी संख्या 500 से ज्यादा थी. इसलिए दलित समुदाय इस युद्ध को ब्रह्माणवादी सत्ता के खिलाफ जंग मानता है. तब से हर साल 1 जनवरी को दलित नेता ब्रिटिश सेना की इस जीत का जश्न मनाते हैं.

इतिहासकारों के मुताबिक, 5 नवंबर 1817 को खड़की और यरवदा की हार के बाद पेशवा बाजीराव द्वितीय ने परपे फाटा के नजदीक फुलगांव में डेरा डाला था. उनके साथ उनके 28,000 सैनिक थे, जिसमें कई जातियों के लोग थे. लेकिन महार समुदाय के सैनिक नहीं थे.दिसंबर 1817 में पेशवा को सूचना मिली कि ब्रिटिश सेना शिरुर से पुणे पर हमला करने के लिए निकल चुकी है. इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों को रोकने का फैसला किया. 800 सैनिकों की ब्रिटिश फौज भीमा नदी के किनारे कोरेगांव पहुंची. इनमें लगभग 500 महार समुदाय के सैनिक थे.

क्यों मनाते हैं जश्न?
नदी की दूसरी ओर पेशवा की सेना का पड़ाव था. 1 जनवरी 1818 की सुबह पेशवा और ब्रिटिश सैनिकों के बीच युद्ध हुआ, जिसमें ब्रिटिश सेना को पेशवाओं पर जीत हासिल हुई. इस युद्ध की याद में अंग्रेजों ने 1851 में भीमा-कोरेगांव में एक स्मारक का निर्माण कराया. हर साल 1 जनवरी को इस विजय की याद में दलित समुदाय के लोग एकत्र होते थे.हालांकि, यह अंग्रेजों ने अपनी शक्ति के प्रतीक के रूप में बनाया गया था, लेकिन अब यह महारों के स्मारक के रूप में जाना जाता है. पिछले साल इसी स्मारक की ओर बढ़ते वक्त दो गुटों में झड़प हो गई जो कि हिंसा का मुख्य कारण बना.पेशवाओं के खिलाफ महारों ने अंग्रेजों का साथ क्यों दिया?
पेशवाओं ने महारों के साथ जिस तरह का बर्ताव किया, इतिहासकार उसके बारे में भी बताते हैं. इस बारे में लिखा गया है कि शहर में घुसते वक्त महारों को अपनी कमर पर झाड़ू बांधकर रखनी होती थी, ताकि उनके कथित अपवित्र पैरों के निशान इस झाड़ू से मिटते चले जाएं. इतना ही नहीं महारों को अपनी गर्दन में एक बर्तन भी लटकाना होता था. इसी बर्तन में थूकते थे. महारों को रास्ते में थूकने की मनाही थी, ताकि जमीन सवर्णों के लिए अपवित्र न हो जाए.

इन नियमों के कारण महार जाति के लोग बहुत अपमानित महसूस करते थे. उनका सामाजिक दायरा काफी सीमित था. महारों को ऐसे सार्वजनिक जगहों पर जाने की मनाही थी, जहां सवर्ण जाति के लोग जाया करते थे. वो सार्वजनिक कुएं से पानी भी नहीं ले सकते थे. सवर्ण के सामने उन्हें ऊंची जगहों पर बैठना भी मना था.

नियमों के खिलाफ कई बार उठी आवाज
ये प्राचीन भारत से चले आ रहे वे नियम थे, जिसके खिलाफ समय-समय पर आवाजें उठती रहीं, लेकिन इन अनुसूचित जाति विरोधी व्यवस्थाओं को बार-बार स्थापित किया गया. इसी व्यवस्था में रहने वाले महारों के पास सवर्णों से बदला लेने का अच्छा मौका था और इसीलिए महार अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी में शामिल होकर लड़े. एक तरफ वे पेशवा सैनिकों के साथ लड़ रहे थे दूसरी तरफ इस क्रूर व्यवस्था का बदला भी ले रहे थे.

लड़ाई खत्म होने के बाद क्या हुआ?
भीमा-कोरेगांव की जंग खत्म होने के बाद महारों के सामाजिक जीवन में कुछ बदलाव आए. अंग्रेजों ने इनके उत्थान और सामाजिक विकास के लिए कई काम किए. अंग्रेजों ने महार जाति के बच्चों के लिए कई स्कूल खोले. धीरे-धीरे उन नियमों को भी खत्म करने की कोशिश हुई, जिनके बोझ तले इतने साल से महार जाति दबी हुई थी.
फिर क्यों भड़की हिंसा?
कुछ दलित नेता इस लड़ाई को उस वक्त के तथाकथित ऊंची जाति के लोगों पर अपनी जीत मानते हैं. वे हर साल 1 जनवरी को अपनी जीत का जश्न मनाते हैं. हालांकि, कुछ संगठन इसे ब्रिटिशों की जीत मानते हुए, इसका जश्न मनाने का विरोध करते हैं. जश्न के दौरान दलित और मराठा समुदाय के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इस दौरान इस घटना में एक शख्स की मौत हो गई, जबकि कई लोग घायल हो गए थे.

इस बार यहां दलित और बहुजन समुदाय के लोगों ने 'एल्गार परिषद' के नाम से शनिवारवाड़ा में कई जनसभाएं की. शनिवारवाड़ा 1818 तक पेशवा की सीट रही है. जनसभा में मुद्दे हिन्दुत्व राजनीति के खिलाफ थे. इस मौके पर कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाषण भी दिए थे और इसी दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी.

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