क्या कांग्रेस तोड़ पाएगी दमोह का तिलिस्म 1989 के बाद से यहां जीत रही भाजपा

जबलपुर । बुंदेलखंड की दमोह लोकसभा सीट इन दिनों फिर चर्चा में है। भाजपा ने जहां यहां से मौजूदा सांसद प्रहलाद पटैल को टिकट दिया है वहीं कांग्रेस ने भी जातीय समीकरण साधने के लिए यहां से प्रताप सिंह लोधी को टिकट थमाया है। १९८९ से लगातार जीत रही भाजपा की चुनौती इस बार कठिन है। मुद्दों से इतर जातीय समीकरण इस सीट पर निर्णायक भूमिका अदा करता है। ऐसे में दोंनों प्रत्याशी एक ही समाज से आते हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि जनता यहां किसको ताज पहनाती है। दमोह लोकसभा सीट पर पहला चुनाव 1962 में हुआ था। यहां पर शुरुआती 3 चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली। बीजेपी को इस सीट पर पहली जीत 1989 में मिली थी। तब से बीजेपी यहां लगातार जीतती आ रही है। बीजेपी 8 चुनावों में यहां पर जीत हासिल कर चुकी है। आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी की नजर लगातार यहां पर नौवीं जीत दर्ज करने पर होगी तो वहीं कांग्रेस इस सीट पर एक बार फिर वापसी करना चाहेगी।
यह है विस के नतीजे
दमोह संसदीय क्षेत्र में विधानसभा की 8 सीटें आती हैं। देवरी, मल्हारा, जबेरा, रहली, पाथरिया, हटा, बंडा, दमोह सीटें इसमें शामिल हैं। इन 8 सीटों में से 4 पर कांग्रेस का कब्जा है, 3 पर बीजेपी और 1 सीट पर बीएसपी के कब्जे में है। ऐसे में अब बीजेपी के लिए यह सीट जीतना किसी चुनौती से कम नहीं है। यहां पर विस सीटों पर कांग्रेस की बढ़त है, जबकि बसपा विधायक का भी कांग्रेस सरकार का समर्थन है। ऐसे में कांग्रेस के पास ५ और बीजेपी के पास ३ सीटें हैं। अब यह देखने वाली बात होगी कि यह समीकरण लोकसभा चुनाव में कितना कारगर साबित होगा।
जातीय समीकरण अहम
इस सीट पर लोधी पटेल और कुर्मी पटेल मतदाताओं की संख्या अधिक है। जिस करवट ये वोटर जाएंगे वहां जीत होना तय है। कुर्मी पटेलों को भाजपा का समर्थक माना जाता है, लेकिन रामकृष्ण कुसमरिया के भाजपा छोडऩे के चलते यह वोट बैंक भाजपा के हाथ से खिसक सकता है। फिलहाल कुसमरिया कांग्रेस के खेमे में चले गए हैं। हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजे भी कुसमरिया के कारण प्रभावित हुए थे। इससे यह माना जा रहा है कि भाजपा से बगावत करके कांग्रेस में गए कुसमरिया भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं।
नाराज कार्यकर्ता को साधने की जिम्मेदारी
प्रहलाद पटेल से जमीनी कार्यकर्ता नाराज हैं। चुनावी सरगर्मी शुरू होने के बाद भी ये कार्यकर्ता ठंडे पड़े हुए हैं। अब प्रहलाद पर इन्हें फिर से साधने की जिम्मेदारी है। हालाकि पटेल पिछला चुनाव दो लाख से भी अधिक मतों के अंतर से जीत चुके हैं। वो लोधी समाज के बड़े नेता माने जाते हैं, जिनकी पकड़ महाकौशल, बुंदेलखंड, बघेलखंड तक है। यह पकड़ कितनी कामयाब होती है यह तो आने वाला समय ही तय करेगा, लेकिन यह माना जा रहा है कि इस बार चुनाव टक्कर का होगा।
