मदर्स डे 12 मई पर विशेष- ईश्वर की प्रतिमूर्ति होती है मॉं

"‘माँ’ वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम−रोम पुलकित हो उठता है|’माँ’ की ममता और उसके आँचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात−रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी−मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अठखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकड़कर चलना सिखाना, प्यार से डांटना−फटकारना, रूठना−मनाना, दूध−दही−मक्खन का लाड़−लड़ाकर खिलाना− पिलाना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार…..ये सब ही तो हर ‘माँ’ की मूल पहचान है।इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की ‘माँ’ की यही मूल पहचान है। एक माँ अपनी औलाद के लिए कितने भी त्याग कर दे लेकिन वो कभीभी इसे अहसान करना नहीं मानती। बल्कि इसे फर्ज़ पूरा करना स्वीकारती है। ——-और यह यथार्थ है कि मां हाड़-मांस की संरचना के रूप में ईश्वर की प्रतिमूर्ति होती है। कहा भी तो गया है कि चूंकि ईश्वर हर जगह उपस्थित नहीं हो सकता,इसलिए उसने मां की संरचना की है। 
 वास्तव में, मां का नाम ज़ुबान पर आते ही मधुर -मधुर-मधुर अनुभूतियां होने लगती हैं। मां फूलों की कोमलता है, चंदन की खुशबू है, नदी की कल-कल है, सूरज का तेज है, चांद की शीतलता है, धरती की ममता है, आकाश की ऊंचाई है, तो वायु का प्रवाह है। यह सत्य है कि रिश्ते-नातों में मां जैसा रिश्ता कोई और नहीं। मां के कर्तव्य में, न संकीर्णता है, न ही कोई स्वार्थ, इसीलिए तो मां को सबसे महान माना गया है। 
 यह यथार्थ है कि हर प्राणी में मां का ह्रदय अपनी संतान के प्रति बहुत ही अधिक स्नेहावेग से आप्लावित होता है। मां की भावनाओं की पावनता सदैव पूजनीय होती है। इसीलिए तो कहा गया है कि, 

"मां का हम पर कर्ज है,है हम पर उपकार। 
मां ने ही हमको दिया, यह सुंदर संसार।।"

'मदर्स डे' भले ही हम हर वर्ष मना लें, पर मां का सम्मान वर्ष के हर दिन, हर पल में होना चाहिए। जीवन के उत्तरार्ध में जब मां को हमारी ज़रूरत होती है, तब हमें कदापि भी उसके प्रति कृतघ्न नहीं होना चाहिए। वास्तव में, मां की सेवा करने के पल मिलना बहुत ही बड़े सौभाग्य बात होती है। मां के वृध्द होने पर उसकी भावनाओं को समझना,उसका साथ देना, फर्ज़ निभाना,जिम्मेदारियां पूरा करना,उसका हर तरह से ध्यान रखना-यह हर पुत्र-पुत्री का दायित्व होता है। और इसमें कदापि भी कोताही बर्दाश्त नहीं की जा सकती। 
 "मां दुआ होती है 
 मां दवा होती है 
 घुटन में 'नीलम', 
 मां हवा होती है। "

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