आत्मा को परमात्मा बनाने की विधि है  चारित्र 

भोपाल।  जितना चिंता का विषय आपके निज का निज में नहीं है उतना पर को संतुष्ट करने के लिये आपको चिंता में डूबना पड़ता है। उक्त उद्गार आचार्य विद्यासागर महाराज के शिष्य मुनिश्री प्रसाद सागर महाराज चौक धर्मशाला में व्यक्त करते हुये कहा कि यर्थात् में चारित्र का पालन व्यवहार रूप में कर रहा है उस पालन का भी कराने वाला ज्ञान है और अवैध में लीनता है इसलिये यहां पर ज्ञान को संयम कहा है और ज्ञान को उत्तम चारित्र भी कहा गया है। आत्मा को परमात्मा बनाने का माध्यम से चारित्र है। मुनिश्री शैल सागर महाराज ने कहा कि सामायिक की लीनता ही ध्यान है, ज्ञान की एकाग्रता का नाम ध्यान है और चित्त की एकाग्रता का नाम भी ध्यान है। योगी जब निज के ज्ञायकभाव से निहारता है तब जगत में किसी को नहीं देखता। किसी को नहीं सुनता वह अपने में ही लीन है। स्वयं में स्वयं की लीनता का नाम भी ध्यान है। जो दृष्टा है वह दृष्टव्य नहीं है और दृष्टव्य है वह दृष्टा नहीं है। जीवन में सहजता, सरलता और समता को सदैव अपने पास रखो तो ज्ञान स्वयमेव प्रकट हो जायेगा। ज्ञान के लिये सयंम चाहिये और संयम के लिये ज्ञान चाहिये जिसने निज की स्वतंत्रा का वेदन किया है वही भगवत्ता को प्राप्त हुआ है। 
नन्दीश्वर जिनालय सिद्धचक्र महामंडल विधान में भक्ति नृत्य कर की इन्द्र-इन्द्राणियों ने भगवान सिद्ध की आराधना 
नन्दीश्वर जिनालय जैन नगर लालघाटी में श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान का आयोजन हो रहा है। आज प्रात: विधान के प्रमुख पात्र राकेश जैन सलामतपुर सौधर्म इन्द्र एवं प्रमोद चौधरी, कुबेर सभी प्रमुख पात्रों द्वारा भगवान जिनेन्द्र का अभिषेक कर सम्पूर्ण जगत में शांति की कामना को लेकर मंत्रौचारित शांति धारा की गई और विधान के मांडने पर अष्टद्रव्यों द्वारा भक्ति नृत्य कर अर्घ्य समर्पित किये गये। श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ इन्द्र, इन्द्राणियों द्वारा भक्ति नृत्य कर भगवान सिद्ध के अनन्त गुणों की वंदना की गई।  
इस अवसर पर नंदीश्वर जिनालय समिति के अध्यक्ष एड. विजय चौधरी, पंकज इंजी, मंदिर समिति के सौरभ इंजीनियर ने बताया कि विधान का समापन 16 जुलाई को विश्व शांति महायज्ञ के साथ होगा। इस अवसर पर भगवान जिनेन्द्र की शोभायात्रा निकाली जायेगी। प्रतिदिन महाआरती के साथ पाठशाला के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति हो रही है। 

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