शेड्यूल ‘M’ लागू होते ही दवाओं की क्वालिटी होगी सुपरहिट, मध्य प्रदेश में घटिया दवाईयों पर कसने लगी लगाम

इंदौर : मध्य प्रदेश में नकली ही नही बल्कि काम चलाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर में सब्सटेंडर्ड दवाइयां बनाना भी अपराध है. ऐसी स्थिति में न केवल फार्मा कंपनी का लाइसेंस निरस्त होगा बल्कि दवा निर्माता को जेल भी जाना पड़ेगा, इसके लिए भारत सरकार द्वारा लागू किए गए शेड्यूल 'M' को लेकर अब मध्य प्रदेश की दवा निर्माता कंपनियां भी सतर्क हो गई हैं और क्वालिटी प्रोडक्ट बनाने के लिए अपग्रेड हो रही हैं.
50 बिलियन डॉलर का है भारतीय दवा बाजार
दुनिया भर में दवाइयां बनाने वाले चौथे सबसे बड़े देश के साथ उत्पादन के लिहाज से भारत 14वें नंबर पर का दवा बाजार है. भारतीय दवा बाजार 50 बिलियन डॉलर का है, जहां से दुनिया भर में जेनेरिक दवाइयां की आपूर्ति 20% और 60% टीकों और वैक्सीन की सप्लाई अमेरिका समेत दुनिया के 200 से ज्यादा देश में होती हैं. जाहिर है इस स्थिति में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की निगरानी भारतीय दवा उद्योग और उच्च कोटि की दवाइयों के निर्माण पर रहती है. भारतीय दवा बाजार इसके लिए बाध्य भी है हालांकि, देश में उपयोग होने वाली और विदेश में निर्यात की जाने वाली दवाइयां में भी क्वालिटी के हिसाब से अंतर है.
शेड्यूल एम को मध्य प्रदेश पर भी असर
भारत सरकार के औषधि नियंत्रक बोर्ड ने भारतीय बाजार में बिकने वाली दवाइयां की क्वालिटी में सुधार के लिए अब शेड्यूल एम के मापदंड प्रभावी तौर पर लागू कर दिए हैं, जिसका असर देश के प्रमुख फार्मा सेक्टर वडोदरा, अहमदाबाद, हैदराबाद, मुंबई, पुणे और इंदौर मे नजर आ रहा है. मध्य प्रदेश की बात करें तो राज्य के फार्मा बेल्ट इंदौर और पीथमपुर में मौजूद कई बड़ी कंपनियों के साथ अब छोटे और मंझोले दवा उद्योगों को भी दवाइयाें के लिहाज से अपग्रेड किया जा रहा. इनमें अपग्रेडेशन के लिहाज से दवाइयां के निर्माण में क्वालिटी कंट्रोल, हाइजीन के अलावा प्रभावी और सुरक्षित दवाइयां बनाने की रणनीति पर काम हो रहा है.
इसके अलावा फैक्ट्री और मशीनरी के अपग्रेडेशन पर फोकस किया जा रहा है, जिससे मध्य प्रदेश में भी उच्च क्वालिटी की मानव हस्तक्षेप रहित और प्रभावकारी दवाइयां तैयार की जा सकें. बेसिक ड्रग डीलर एसोसिएशन समेत दवाई उद्योग से जुड़े कई संगठन अब तमाम दवा निर्माताओं को तरह-तरह के अपग्रेडेशन के अवसरों के अलावा नई-नई मशीनरी और उन्नत दवाओं के निर्माण में सहयोग कर रहे हैं, जिससे उद्योगों को लाइसेंस निरस्त होने के साथ बंद होने की स्थिति से बचाया जा सके.
क्या है शेड्यूल एम और क्यों है जरूरी?
मापदंडों के हिसाब से उच्च गुणवत्ता की दवाइयां भारतीय फार्मा सेक्टर में भी तैयार हो सकें, इसके लिए भारत सरकार के खाद एवं औषधि प्रशासन मंत्रालय ने संशोधित शेड्यूल एम को लागू किया है. इसके तहत 250 करोड़ रुपए से कम टर्नओवर वाली फार्मा कंपनियों को 31 दिसंबर 2025 तक के मापदंड के हिसाब से अपनी फार्मा कंपनियों को मशीनरी के अलावा अनुभवी स्टाफ, निर्धारित मापदंड के हिसाब से दवा निर्माण यूनिट और अन्य तमाम शर्तों के हिसाब से अपग्रेड होना था. इसके लिए सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ)
लेकिन मध्य प्रदेश में ढाई सौ से अधिक छोटी बड़ी दवा निर्माता कंपनियां के लिए यह इतना आसान नहीं था. लिहाजा इस मामले में अब टाइम लिमिट बढ़ाने की मांग की गई है. वहीं, मध्य प्रदेश ड्रग कंट्रोल एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा अब तमाम कंपनियां के लिए गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस के मानकों के पालन के साथ उन्हें अपग्रेड होने को लेकर भी लगातार मॉनीटरिंग कर रहा है.
एमपी में नकली दवाइयां के कई मामले
मध्य प्रदेश में नकली दवाओं की बिक्री की घटनाएं अब आम हो चुकी हैं. हाल ही में छिंदवाड़ा समेत अन्य इलाकों में दूषित सिरप पीने से 20 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई थी. हालांकि यह दवाई तमिलनाडु की एक फार्मा कंपनी द्वारा तैयार करके भेजी गई थी. 2024 में भी भोपाल में कोडीन मिश्रित कफ सिरप की 72 हजार से ज्यादा बोतलें जब्त की गईं थी. इसके अलावा अमानक और जेनेरिक दवाइयां के भी कम गुणवत्ता वाले होने के तमाम मामले सामने आ चुके हैं. हालांकि, राज्य में कमजोर मॉनिटरिंग सिस्टम और फार्मा कंपनियों और ड्रग इंस्पेक्टर्स की मिली भगत के चलते सब स्टैंडर्ड दवाइयां का कारोबार फल फूल रहा है.
के निर्देश पर राज्यों के औषधि प्रशासन विभाग के समक्ष अपना अपग्रेडेशन प्लान भी जमा करना था.
