झंग बिरादरी में 120 साल पुरानी परंपरा: होली पर रामलीला का अनोखा आयोजन, पाकिस्तान से जुड़ा इतिहास

ग्वालियर: दिवाली-दशहरा के समय पूरे देश में रामलीला आयोजन होते हैं. रामायण से प्रेरित ये नाट्य संवाद भगवान राम की जीवन और लीलाओं को कलाकारों द्वारा जीवंत किए जाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पिछले 79 वर्षों से देश में एक मात्र ऐसी रामलीला ग्वालियर में होती आ रही है जो रंगों के त्योहार होली के समय ही आयोजित होती है. इस विशेष रामलीला का आम कलाकारों द्वारा नहीं पाकिस्तान से आए झंग बिरादरी के लोगों द्वारा पिछले 120 वर्षों से मंचन किया जा रहा है. आइए जानते हैं कि, आखिर कैसे इस रामलीला की शुरुआत हुई और कैसे ये पाकिस्तान से ग्वालियर तक पहुंची.
पिछले 120 साल से चली आ रही परंपरा
ग्वालियर शहर के ऊंटपुल के पास हनुमान जी का एक छोटा सा सिद्ध मंदिर है, जिसे झंग बिरादरी के लोगों द्वारा बनवाया गया था, और इसी स्थान पर होली के समय पिछले कई दशकों से इस क्षेत्र की सबसे पुरानी परंपरा का निर्वहन आज भी हो रहा है. ये परंपरा है झंग बिरादरी की रामलीला, जो पिछले 120 वर्षों से हर साल आयोजित होती है. जिसमे अदाकारी करने वाले कलाकार देश के कोने कोने से आते हैं.
होली पर होने वाली देश की एक मात्र रामलीला
अमूमन रामलीला का आयोजन दशहरे के समय किया जाता है लेकिन ग्वालियर में झंग बिरादरी होली से ठीक पहले इकट्ठा होती है. इसके लिए ग्वालियर के अलावा पंजाब, हरियाणा, नई दिल्ली, चंडीगढ़ और कुछ लोग कश्मीर से आते हैं. ये लोग होली से करीब 8 दिन पहले यहां आ जाते हैं. इसके बाद रामलीला के पात्र और तैयारियों को लेकर व्यस्थाओं में जुट जाते हैं.कलाकार जहां पहले से रिहर्सल करते हैं तो वहीं अन्य लोग स्टेज लेकर कॉस्ट्यूम और हर जरूरी चीज पर ध्यान देते हैं. इन कलाकारों का कहना है कि, वे अपने शहरों की होली छोड़ कर एक साथ होली मनाने के लिए ग्वालियर में इकट्ठा होते हैं और इस रामलीला का हिस्सा बनते हैं.
रामलीला का है पाकिस्तान से कनेक्शन
ग्वालियर की आदर्श रामलीला समिति जो झंग बिरादरी की रामलीला कहलाती है का सीधा जुड़ाव पाकिस्तान से है. क्योंकि जब पाकिस्तान का अलगाव नहीं हुआ था और देश अखंड भारत था तब पाकिस्तान क्षेत्र के झंग जिले के रसीदपुर गांव में रामलीला का नाटक हुआ करता था.झंग बिरादरी की रामलीला में गुरु वशिष्ठ का किरदार निभाने वाले प्रमोद कुमार पहावा कहते हैं कि "ये रामलीला उनके पूर्वजों द्वारा शुरू की गई थी, पहले नाटकों का मंचन किया जाता था. धीरे धीरे नाटकों ने रामलीला का रूप ले लिया. इसके पीछे सोच थी कि, बच्चों में रामलीला के जरिए भगवान राम के संस्कार आएं. वे खुद पिछले 35 वर्षों से रामलीला से जुड़े हुए हैं. जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है."
प्रमोद पाहवा बताते हैं कि "अखंड भारत का जब विभाजन हुआ और पाकिस्तान अलग हुआ तो रसीदपुर गांव से रामलीला से जुड़े सभी लोग भारत के अलग अलग हिस्सों में बस गए कुछ पंजाब कुछ हरियाणा और कुछ नई दिल्ली में और कुछ लोग ग्वालियर रियासत में आकर बस गए लेकिन रामलीला नहीं रुकी, 1948 से रामलीला ग्वालियर में आयोजित होने लगी.
हर उम्र के कलाकार, कोई मैनेजर तो कोई दुकानदार
रामलीला से जुड़ना झंग बिरादरी के हर शख्स के लिए परंपरा ही नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी होती है. इसलिए यहां जब रामलीला का आयोजन होता है तो हर उम्र के कलाकार होते हैं. कोई 17 वर्ष का बालक है तो कोई 80 वर्ष के बुजुर्ग, 10-12 साल के बच्चे भी रामलीला आयोजन में मदद करते हैं. 80 वर्षीय वासुदेव पोपली इस उम्र में भी दिल्ली से हर साल ग्वालियर आते हैं. वे बताते हैं कि "उनके परिवार की चार पीढ़ियां इस रामलीला का हिस्सा हैं. पहले उनके पिता इस रामलीला में राजा दशरथ का किरदार निभाते थे, करीब 35 वर्षों अब वे खुद भोले शंकर का पात्र निभाते आ रहे हैं. उनका भतीजा भी रामलीला में अलग-अलग किरदार करता है और अब पोता चीनू लक्ष्मीजी का रोल अदा करता है."
कई कलाकार हैं ऑलराउंडर
वासुदेव की तरह रोहतक से आए रामनरेंद्र धवन भी एक ऑलराउंडर कलाकार हैं, वे रामलीला में कहीं भी फिट हो जाते हैं. पिछले 40 वर्षों से अलग-अलग किरदार निभाते आ रहे हैं, इस साल उन्हें रामलीला का सूत्रधार बनाया गया है. वे कहते है कि "रामलीला से लोगों पर काफी प्रभाव पड़ा है. इस रामलीला से आपसी प्रेम बढ़ा है, संस्कार बढ़े हैं, बच्चे धर्म की और आकर्षित हो रहे हैं."रामलीला में कुंभकरण का पात्र कर रहे हिमांशु कवाथला पेशे से एक नामी बीफार्मा कंपनी में एरिया मैनेजर हैं. लेकिन वे हर साल होने वाली इस रामलीला में पिछले 10 वर्षों से कुंभकरण का रोल कर रहे हैं. इसके अलावा वे बीते 4 वर्षों से मारीच और ताड़का का किरदार भी कर रहे हैं.हिमांशु कहते हैं कि "बचपन में उनका सपना हुआ करता था कि, उनके पूर्वजों की इस विरासत का वे भी हिस्सा बनें. जैसे जैसे बड़े हुए तो छोटे रोल मिले, कभी भारत की सेना का हिस्सा बने तो कभी मंत्री का रोल किया और आज वे रामलीला के अहम किरदारों को निभा रहे हैं. अपने काम से तो वे पूरे प्रदेश में घूमते हैं लेकिन रामलीला के समय किसी भी तरह वे ग्वालियर में आ ही जाते हैं. यहां कोई भी कलाकार कोई पैसा नहीं लेता, सभी बस पूर्वजों की इस धरोहर को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं."
'कोई पैसा नहीं, सिर्फ अपनी परंपरा के लिए आते हैं कलाकार'
झंग बिरादरी से आने वाले हरिओम नागपाल रामलीला समिति के अध्यक्ष हैं. वे बताते हैं कि "ये रामलीला अखंड भारत के झंग जो आज पाकिस्तान में है से शुरू हुई थी. इसे लगभग 120 वर्ष पहले इनके पूर्वजों ने शुरू किया था और आज उनके वंशज मिलकर इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं. सभी सदस्य झंग बिरादरी से हैं. उन्हें खुद रामलीला से जुड़े हुए 50 साल से अधिक हो चुके हैं.यहां जो भी कलाकार आते हैं, वे बिरादरी की परंपरा को निभाने आते हैं. कोई इसके लिए फीस नहीं लेता, बल्कि यहां आने के बाद मंदिर और रामलीला आयोजन के लिए दान करके ही जाते हैं. हरिओम कहते हैं कि "शुरू में रामलीला बहुत सामान्य हुआ करती थी, लेकिन इतने वर्षों में टेक्नोलॉजी के साथ रामलीला भी बेहतर होती गई आज ये रामलीला भी काफी डिजिटल हो चुकी है."
क्या है रामलीला का असल उद्देश्य?
अब सवाल आता है कि इस रामलीला का उद्देश्य क्या था और क्यों इसकी शुरुआत हुई तो बता दें कि झंग बिरादरी के लोगों ने ये रामलीला अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने के लिए शुरू की थी. इन लोगों का कहना है कि होली के समय हुड़दंग होता है लोग त्योहार की आड़ में नशा पत्ता करने लगते हैं. उनके युवा इससे दूर रहे हैं और जीवन को अध्यात्म के साथ जिएं, इसी मकसद के साथ ये रामलीला होली के समय आयोजित की जाती है.
