पश्चिम एशिया संघर्ष लंबा खिंचा तो क्या होगा? इस रिपोर्ट ने जताई ऐसी आशंका

पश्चिम एशिया में जारी तनाव का वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों पर असर पड़ सकता है। मॉर्गन स्टेनली की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर यह संघर्ष कई सप्ताह तक जारी रहता है तो आर्थिक और बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है।
संघर्ष की अवधि क्यों महत्वपूर्ण है?
रिपोर्ट में कहा गया है कि संघर्ष की अवधि इसका सबसे महत्वपूर्ण कारक होगी। अगर टकराव सीमित और कम समय का रहता है तो आर्थिक असर सीमित रह सकता है, लेकिन लंबा खिंचने पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, महंगाई और वित्तीय अनिश्चितता का दबाव बढ़ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि यह सैन्य कार्रवाई चार से पांच सप्ताह तक चल सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक तेल की कीमतें महंगाई के रुझान तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी।
आपूर्ति झटके के कारण अगर तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है तो अगले तीन महीनों में अमेरिका में उपभोक्ता महंगाई दर लगभग 0.35 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
ऊर्जा कीमतें जितनी अधिक समय तक ऊंची रहेंगी, महंगाई का दबाव उतना ही बढ़ सकता है।
निवेशक इस समय किस ओर रुख कर रहे?
भू-राजनैतिक तनाव के समय निवेशक अक्सर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हो सकता है और इससे महंगाई के कुछ दबाव को कम किया जा सकता है। हालांकि तेल महंगा होने से उपभोक्ता खर्च पर भी असर पड़ सकता है क्योंकि लोगों को पेट्रोल-डीजल पर अधिक खर्च करना पड़ेगा।
अमेरिकी की घरेलू राजनीति पर कैसे पड़ेगा असर?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह संघर्ष अमेरिका की घरेलू राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है, खासकर आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले जब महंगाई और जीवनयापन की लागत बड़ा मुद्दा बनी हुई है। अगर संघर्ष लंबा चलता है तो बढ़ती कीमतें राजनीतिक बहस का प्रमुख मुद्दा बन सकती हैं।
ट्रंप ने रक्षा बजट का प्रस्ताव कितना रखा?
मॉर्गन स्टेनली के अनुसार अमेरिका की बढ़ती सैन्य भागीदारी से रक्षा खर्च में भी बढ़ोतरी हो सकती है। राष्ट्रपति ट्रंप ने करीब 1.5 ट्रिलियन डॉलर के रक्षा बजट का प्रस्ताव रखा है, जो मौजूदा बजट से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है और कोरियाई युद्ध के बाद का सबसे बड़ा स्तर होगा। इससे पहले से ऊंचे सरकारी कर्ज और बजट घाटे पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
पिछले युद्धों में कैसा रहा है बाजार का हाल?
इतिहास बताता है कि युद्ध के दौरान भी बाजार कभी-कभी बढ़त दर्ज करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक खाड़ी युद्धों के बाद तीन से छह महीनों में शेयर बाजारों में दो अंकों की बढ़त देखी गई थी, जिसमें रक्षा क्षेत्र की कंपनियों के शेयर प्रमुख रहे। हालांकि अगर ईरान पर दबाव बना रहता है तो तेल की कीमतें ऊंची रह सकती हैं।रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भू-राजनीतिक जोखिम अब वैश्विक बाजारों के लिए अस्थायी झटका नहीं बल्कि स्थायी कारक बनता जा रहा है। ऐसे में निवेशकों को निवेश रणनीति बनाते समय क्षेत्रीय संघर्षों और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखना होगा।
इस संघर्ष का भारत पर क्या असर?
इस तनाव का असर भारत पर भी दिखाई दे रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण भारतीय शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। बुधवार को बीएसई सेंसेक्स 1.4 प्रतिशत यानी 1,123 अंक गिरकर 79,116 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 1.6 प्रतिशत यानी 385 अंक गिरकर 24,480 पर आ गया।रिपोर्ट के अनुसार 2026 में निवेशकों के लिए रक्षा, सुरक्षा, एयरोस्पेस और औद्योगिक मजबूती से जुड़े क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने के अवसर बन सकते हैं, क्योंकि सरकारों का खर्च इन क्षेत्रों में दीर्घकालिक मांग को बढ़ा सकता है।
