लंबित फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी, हाई कोर्ट्स को चेतावनी

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने शुक्रवार को देश की न्यायिक प्रणाली में होने वाली देरी को कम करने और फैसलों की त्वरित डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। देश के सभी उच्च न्यायालयों (हाई कोर्ट्स) के लिए बेहद कड़े और बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि फैसलों में होने वाली लंबी देरी न्यायपालिका के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर करती है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने संविधान द्वारा प्रदत्त अनुच्छेद 142 (Article 142) की विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षित रखे गए फैसलों (रिजर्व जजमेंट) को अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना अनिवार्य होगा।

जमानत मामलों के लिए बेहद सख्त समय-सीमा तय

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखते हुए जमानत याचिकाओं (बेल अप्लीकेशंस) के निपटारे के लिए नए और कड़े नियम तय किए हैं:

  • उसी दिन या अगले दिन फैसला: सभी हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया गया है कि वे मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद उसी दिन जमानत पर अपना फैसला सुनाएं। यदि किसी परिस्थिति में आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले ही दिन हर हाल में सुनाना होगा।

  • निचली अदालतों को तुरंत सूचना: किसी भी कैदी की नियमित जमानत मंजूर होने के तुरंत बाद इसकी आधिकारिक सूचना संबंधित निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) को भेजी जानी चाहिए।

  • उसी दिन रिहाई अनिवार्य: जमानत पाने वाले विचाराधीन कैदियों (अंडरट्रायल कैदियों) को सभी आवश्यक कागजी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद उसी दिन जेल से रिहा किया जाना सुनिश्चित किया जाए।

वेबसाइट पर 24 घंटे में अपलोड करना होगा फैसला

न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए शीर्ष अदालत ने डिजिटल सुधारों पर भी जोर दिया है। आदेश के मुताबिक, हाई कोर्ट द्वारा कोई भी फैसला सुनाए जाने के ठीक 24 घंटे के भीतर उसे संबंधित अदालत की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करना होगा। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी भ्रम को दूर करते हुए स्पष्ट किया कि जिस तारीख को अदालत में फैसले का मुख्य भाग (ऑपरेटिव पार्ट) पढ़कर सुनाया जाता है, ठीक उसी तारीख को ही फैसले की आधिकारिक और कानूनी तारीख माना जाएगा।

झारखंड हाई कोर्ट के मामले की सुनवाई के दौरान आया आदेश

CJI सूर्यकांत की पीठ ने न्याय के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय हमारे देश की वे प्राथमिक संस्थाएं हैं, जहां हर दिन हजारों गरीब और जरूरतमंद लोग न्याय व राहत की उम्मीद में पहुंचते हैं। शीर्ष अदालत ने यह भी साफ किया कि इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य किसी भी न्यायाधीश या न्यायिक संस्थान की कार्यप्रणाली पर आक्षेप लगाना या उंगली उठाना नहीं है, बल्कि व्यवस्था को सुधारना है। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक और देशव्यापी निर्देश झारखंड हाई कोर्ट के कुछ फैसलों और उन्हें वेबसाइट पर अपलोड करने में हुई अत्यधिक देरी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आया है।

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