अभिषेक बनर्जी पर पूर्व टीएमसी विधायक का तंज: ‘सुरक्षा घेरा हटते ही जनता के डर से मांग रहे सेंट्रल फोर्स, खो चुके हैं जनाधार’

कोलकाता | पश्चिम बंगाल के सियासी समर में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सुलग रही अंदरूनी बगावत और गुटबाजी अब पूरी तरह से चौराहे पर आ चुकी है। पार्टी से हाल ही में बाहर का रास्ता दिखाए गए निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी ने मंगलवार को टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया। उन्होंने तीखा हमला बोलते हुए दावा किया कि सोनारपुर इलाके में आम जनता के भारी विरोध और आक्रोश का सामना करने के बाद अब अभिषेक बनर्जी खुद के लिए केंद्रीय सुरक्षा बल (CAPF) के सुरक्षा घेरे की गुहार लगा रहे हैं। रितब्रत बनर्जी ने तंज कसते हुए सवाल दागा कि जो नेता मंचों से दहाड़ते थे कि जनता ही उनका सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है, उन्हें अब अचानक केंद्रीय जवानों की बैरिकेडिंग की आवश्यकता क्यों महसूस होने लगी है?

हार के बाद 26 दिनों का 'अज्ञातवास' और आई-पैक के कॉरपोरेट मॉडल पर तीखा प्रहार

मंगलवार दोपहर अचानक राज्य विधानसभा परिसर पहुंचे रितब्रत बनर्जी ने मीडिया के कैमरों के सामने टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने तल्ख लहजे में कहा कि 24 मई को चुनावी मोर्चे पर मिली करारी शिकस्त के बाद अभिषेक बनर्जी पूरे 26 दिनों तक घर के भीतर दुबके रहे। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा, "अगर वे सचमुच इतने बड़े जननेता हैं, तो उन्हें सुरक्षा बलों के पीछे छिपने की जरूरत क्यों आ पड़ी? लोग मुझे विद्रोही या गद्दार कह सकते हैं, लेकिन किसी माई के लाल में मुझे चोर कहने की हिम्मत नहीं है।" रितब्रत ने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी ने 'आई-पैक' (I-PAC) नामक बाहरी एजेंसी के जरिए तृणमूल कांग्रेस को एक राजनीतिक दल के बजाय कॉरपोरेट कंपनी की तरह चलाने का प्रयास किया, जिससे पार्टी जमीनी कार्यकर्ताओं से पूरी तरह कट गई और उसे यह दिन देखना पड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि टीएमसी का निर्माण ममता बनर्जी ने अपने खून-पसीने से किया था और वे आज भी ममता बनर्जी का व्यक्तिगत तौर पर सम्मान करते हैं।

फर्जी हस्ताक्षर कांड और विधानसभा से दो विधायकों के निष्कासन का पूरा सच

रितब्रत बनर्जी और एंटाली विधानसभा सीट से टीएमसी विधायक संदीपन साहा के खिलाफ पार्टी ने सोमवार को निष्कासन की गाज गिराई थी। इस अनुशासनात्मक कार्रवाई की पटकथा उस वक्त लिखी गई, जब मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के एक राजनीतिक दांव के बाद विधानसभा में हड़कंप मच गया। दरअसल, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से जुड़े एक महत्वपूर्ण सरकारी प्रस्ताव पर विधायकों के हस्ताक्षरों (सिग्नेचर) में हेरफेर और गड़बड़ी की बात सामने आई थी। मुख्यमंत्री के दावों के मुताबिक, रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने ही सबसे पहले इस फर्जी हस्ताक्षर वाले मामले को विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के सचिवालय के समक्ष उजागर किया था। अपनी ही पार्टी के प्रस्ताव पर सवाल खड़े करने और विपक्षी लाइन का समर्थन करने के चलते टीएमसी आलाकमान ने इसे घोर अनुशासनहीनता माना और दोनों को तत्काल प्रभाव से दल से निष्कासित कर दिया।

सीआईडी (CID) जांच के घेरे में विधानसभा के पद, बिखरने की कगार पर तृणमूल कांग्रेस

इस पूरे हस्ताक्षर विवाद की गंभीरता को देखते हुए अब इसकी आधिकारिक तफ्तीश पश्चिम बंगाल की अपराध जांच शाखा (CID) को सौंप दी गई है। शुरुआती आरोपों के अनुसार, राज्य विधानसभा के भीतर विपक्षी खेमे के लिए आरक्षित चार बेहद शक्तिशाली और महत्वपूर्ण पदों के आवंटन से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज पर कई विधायकों के दस्तखत मेल नहीं खा रहे हैं। सीआईडी की एंट्री ने टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व की धड़कनें बढ़ा दी हैं, क्योंकि जांच की आंच पार्टी के कई बड़े चेहरों तक पहुंच सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि हालिया चुनावों में मिली सांगठनिक असफलता के बाद तृणमूल के भीतर असंतोष का जो ज्वालामुखी सुलग रहा था, रितब्रत बनर्जी की यह खुली बगावत उसका महज एक ट्रेलर है। आने वाले दिनों में यह अंतर्विरोध पार्टी में एक बड़े विभाजन का रूप भी ले सकता है।

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