मोहन-हेमंत के लिए मौका, उमंग और जीतू के लिए अग्नि परीक्षा क्यों?

भोपाल: मध्यप्रदेश की राज्यसभा राजनीति में भाजपा द्वारा तीसरा प्रत्याशी उतारे जाने के बाद प्रदेश का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। इस फैसले ने कांग्रेस को साल 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक तरह की मिनी अग्निपरीक्षा में ढकेल दिया है। लेकिन, इस राजनैतिक बिसात पर केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भाजपा का प्रदेश नेतृत्व भी दांव पर लगा हुआ है। अगर भाजपा इस सीट को जीतने में कामयाब रहती है, तो दिल्ली दरबार में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का राजनैतिक कद काफी बढ़ जाएगा, लेकिन अगर हार मिली तो उनके नेतृत्व पर भी सवाल उठना तय है। दूसरी ओर, कांग्रेस खेमे में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के लिए आने वाले दिन किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं हैं, क्योंकि राहुल गांधी की टीम इस पूरे घटनाक्रम के जरिए दोनों के नेतृत्व और प्रबंधन क्षमता को करीब से परखेगी।
भाजपा के लिए जीत-हार के मायने
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के लिए यह जीत कई मायनों में बेहद खास होगी, लेकिन हारने पर भी पार्टी को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होगा क्योंकि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस के खिलाफ किए गए एक प्रयोग के तौर पर देख रही है।
जीतने के फायदे: राजनीतिक जानकारों के अनुसार, तीसरी सीट जीतने के लिए हालांकि भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, लेकिन अगर वे जीतते हैं तो राज्यसभा में पार्टी की ताकत और बढ़ेगी। इसके साथ ही अगले ढाई साल तक कांग्रेस को हर मोर्चे पर हतोत्साहित करने का मौका मिलेगा। भाजपा जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस के विधायक भी उनकी नीतियों से प्रभावित होकर उनका सहयोग कर रहे हैं।
हारने के नुकसान: यदि भाजपा चुनाव हार जाती है, तो जनता के बीच यह सवाल उठना तय है कि बहुमत न होने के बावजूद भाजपा ने यह जोखिम क्यों उठाया। वहीं कांग्रेस को 'विक्टिम कार्ड' खेलने का मौका मिल जाएगा और वह आरोप लगाएगी कि महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले दल ने जोड़-तोड़ और धोखे से जीतने की नाकाम कोशिश की।
कांग्रेस के लिए साख की लड़ाई
बहुमत होने के बावजूद अगर कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन इस चुनाव में सफल नहीं हो पाती हैं, तो यह कांग्रेस पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा और गहरा सदमा साबित होगा।
जीतने के फायदे: राजनैतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि कांग्रेस तमाम दबावों के बाद भी यह सीट जीत लेती है, तो यह भाजपा को उसकी अपनी ही बिसात पर बहुत बड़ा जवाब होगा। पिछले 20 वर्षों से विपक्ष में रहने के बावजूद पार्टी की यह एकजुटता उसकी मजबूती को दिखाएगी। इससे राहुल गांधी का विश्वास प्रदेश नेतृत्व पर और ज्यादा बढ़ेगा, जिससे आने वाले नगरीय निकाय चुनावों में पार्टी को नई ऊर्जा मिलेगी। साथ ही कांग्रेस यह प्रचारित कर सकेगी कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ जाने वाली भाजपा को मुंह की खानी पड़ी है।
हारने के नुकसान: पूर्ण बहुमत होने के बाद भी यदि कांग्रेस हारती है, तो वह जनता का विश्वास खो देगी, जिसका सीधा असर अगले निकाय और विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है। भाजपा इस हार को ढाल बनाकर जनता के बीच जाएगी और बताएगी कि कांग्रेस के भीतर भारी खींचतान है और वे एकजुट नहीं हैं, ऐसे में वे प्रदेश का विकास कभी नहीं कर सकते।
