परिसीमन के बाद TMC बागियों पर बड़ा फैसला संभव

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में संभावित फेरबदल की सुगबुगाहट के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कथित बागी सांसदों को लेकर फिलहाल असमंजस की स्थिति में है। एक तरफ जहां पार्टी के सामने संसद में अपना संख्या बल बढ़ाने का एक बड़ा अवसर है, वहीं दूसरी तरफ बंगाल में जमीनी स्तर पर संघर्ष कर रहे पार्टी कार्यकर्ताओं की संभावित नाराजगी केंद्रीय नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, भाजपा आलाकमान इस बात पर गंभीरता से मंथन कर रहा है कि टीएमसी से अलग होने की राह देख रहे नेताओं को सीधे तौर पर भाजपा में एंट्री दी जाए या फिर उन्हें किसी अलग गुट के रूप में पहचान बनाए रखने को कहा जाए। माना जा रहा है कि पार्टी इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई भी जल्दबाजी भरा कदम उठाने से बच रही है और आने वाले समय में परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे बड़े राजनीतिक फैसलों की दिशा पूरी तरह स्पष्ट होने का इंतजार कर रही है।
केंद्रीय मंत्री के आवास पर मैराथन बैठक और 'वेट एंड वॉच' की रणनीति
हाल ही में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के दिल्ली स्थित आवास पर देर रात तक चली एक उच्च स्तरीय बैठक में भी इस विषय पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका। इस महत्वपूर्ण बैठक में पश्चिम बंगाल भाजपा के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी की भी चर्चा है। सूत्रों का दावा है कि बैठक में फिलहाल किसी भी जल्दबाजी से बचते हुए टीएमसी के असंतुष्ट सांसदों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने और राज्य के बदलते सियासी घटनाक्रम पर पैनी नजर रखने की रणनीति पर सहमति बनी है।
संसद में संख्या बल और कार्यकर्ताओं की भावना का संतुलन
भाजपा नेतृत्व के सामने आगामी समय में लोकसभा और राज्यसभा में अपने संख्या बल को और अधिक मजबूत करने की बड़ी चुनौती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े बड़े संवैधानिक सुधारों को अमलीजामा पहनाने के लिए संसद में एक मजबूत और अचूक बहुमत की जरूरत होगी। ऐसे में विपक्षी खेमे के असंतुष्ट चेहरों का साथ मिलना भाजपा के लिए रणनीतिक तौर पर काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।
हालांकि, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा इस पक्ष में है कि बंगाल में टीएमसी के खिलाफ जमीन पर कड़ा संघर्ष करने वाले स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावनाओं की अनदेखी न की जाए। कार्यकर्ताओं को लगता है कि जिन नेताओं के खिलाफ उन्होंने लड़ाई लड़ी, उन्हें सीधे गले लगाना ठीक नहीं होगा। इसी आंतरिक मतभेद के चलते आलाकमान फिलहाल 'देखो और इंतजार करो' (वेट एंड वॉच) की नीति अपनाए हुए है।
बंगाल के नए सियासी समीकरणों पर टिकी निगाहें
राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी पुरजोर चर्चा है कि यदि टीएमसी के भीतर आंतरिक असंतोष और ज्यादा गहराता है, तो राज्य की विधानसभा से लेकर दिल्ली में संसद के स्तर तक नए राजनीतिक समीकरण देखने को मिल सकते हैं। इसके तहत बागी धड़ा बंगाल की राजनीति में एक अलग तीसरे मोर्चे के रूप में उभर सकता है, जो केंद्र में सत्तारूढ़ दल को समर्थन दे सकता है। बहरहाल, इस पूरे मामले पर न तो भाजपा और न ही टीएमसी की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने आया है, जिससे यह पूरा घटनाक्रम फिलहाल सूत्रों के दावों और राजनीतिक कयासों के दायरे में ही बना हुआ है।
