छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप एक ही काल में होते तो भारत का इतिहास कुछ और होता-राज्यपाल

जयपुर: राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने बुधवार को महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर भारतीय क्षत्रिय महासंघ द्वारा आयोजित एक विशेष समारोह में शिरकत की। इस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने क्षत्रिय समाज की होनहार प्रतिभाओं को सम्मानित किया। अपने संबोधन में राज्यपाल ने एक बेहद दिलचस्प बात कही कि यदि छत्रपति शिवाजी महाराज और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप एक ही कालखंड में हुए होते, तो आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता। दोनों ही महानायकों ने अपने अदम्य साहस और शौर्य से मुगल आक्रांताओं के हौसलों को पस्त किया था।
चार गुना बड़ी मुगल सेना को चटाई धूल और दिवेर में कराया सरेंडर
ऐतिहासिक तथ्यों को रेखांकित करते हुए राज्यपाल ने बताया कि हल्दीघाटी के प्रसिद्ध युद्ध में अकबर ने खुद सीधे महाराणा प्रताप का सामना करने के बजाय राजा मानसिंह को कमान सौंपकर भेजा था। उस समय अकबर की सेना में लगभग एक लाख सैनिक थे, जबकि महाराणा प्रताप के पास मात्र बीस हजार के करीब योद्धा थे। इसके बावजूद, चार गुना बड़ी सेना के सामने घुटने टेकने के बजाय प्रताप ने मुगलों को कड़ी टक्कर दी। बाद में एक बेहद सुनियोजित रणनीति के तहत उन्होंने दिवेर के युद्ध में अकबर की सेना को आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने पर मजबूर कर दिया। वे देश के ऐसे पहले स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए कभी समझौता नहीं किया।
सर्वसमाज को साथ लेकर लड़े और कायम रखी स्त्री अस्मिता की मिसाल
श्री बागडे ने महाराणा प्रताप के उच्च नैतिक मूल्यों और स्त्री सम्मान से जुड़े एक प्रेरक प्रसंग का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब प्रताप के पुत्र अमरसिंह ने मुगल सेनापति अब्दुल रहीम खान-ए-खाना के परिवार की महिलाओं को बंदी बना लिया था, तब महाराणा ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई थी। उन्होंने पूरी मर्यादा का पालन करते हुए उन बेगमों को ससम्मान वापस भिजवाया। इसके अलावा, उनकी सेना की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उसमें केवल राजपूत ही नहीं, बल्कि भील जनजाति, जाट और अन्य समाजों के योद्धा भी कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते थे। भील सरदार राणा पूंजा उनकी सेना के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक थे।
मेवाड़ की पावन धरा और नई शिक्षा नीति में वास्तविक इतिहास की जरूरत
मेवाड़ को भक्ति और शक्ति की अद्भुत भूमि बताते हुए राज्यपाल ने बप्पा रावल, महाराणा सांगा और त्याग की प्रतिमूर्ति पन्ना धाय को भी नमन किया। उन्होंने याद दिलाया कि बप्पा रावल ने अरब आक्रमणकारियों को भारत से ऐसा खदेड़ा था कि वे अगले सौ सालों तक इस ओर आंख उठाकर भी नहीं देख सके। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की नई पीढ़ी को देश का सच्चा और गौरवशाली इतिहास जानने का पूरा अधिकार है। इसके लिए उन्होंने नई शिक्षा नीति (NEET) के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने और बच्चों की बौद्धिक क्षमता को निखारने का आह्वान किया, ताकि युवा वर्ग महाराणा प्रताप के आदर्शों से प्रेरणा लेकर अन्याय के खिलाफ खड़ा हो सके।
