अयोध्या राम मंदिर विवाद: चढ़ावे की कथित चोरी पर हाईकोर्ट में अहम सुनवाई आज

अयोध्या। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में स्थित सुप्रसिद्ध श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के चढ़ावे और दान राशि में हुई कथित वित्तीय अनियमितता व चोरी का मामला अब अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। सोमवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में समय के अभाव (समयाभाव) के चलते इस अति-संवेदनशील मामले पर सुनवाई नहीं की जा सकी। अदालती व्यस्तता के कारण अब इस संबंध में दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर आगामी 24 जून को सुनवाई होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। इस याचिका में मंदिर के चढ़ावे में हुए कथित गबन की उच्च स्तरीय जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या किसी अन्य निष्पक्ष स्वतंत्र एजेंसी से कराने तथा पूरे चढ़ावे व दान का व्यापक ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग – CAG) से कराने की गुहार लगाई गई है। यह महत्वपूर्ण याचिका न्यायमूर्ति पंकज भाटिया और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की ग्रीष्मकालीन अवकाश पीठ (समर वेकेशन बेंच) के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की गई थी।
कैग ऑडिट और स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने के लिए याचिका दायर
अदालत में समय की कमी के चलते मामले को आगे बढ़ा दिया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता मोहित अशोक द्वारा जनहित में दायर की गई इस याचिका में यह दलील दी गई है कि देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा आस्था के साथ भगवान रामलला को अर्पित किए गए चढ़ावे के धन में बड़े पैमाने पर हेरफेर और कथित गबन किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय स्तर पर जांच कराने के बजाय इसकी कमान सीधे सीबीआई या किसी केंद्रीय स्वतंत्र जांच एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए। साथ ही, पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मंदिर ट्रस्ट के खातों और चढ़ावे की राशि का कैग से विशेष ऑडिट कराया जाना बेहद जरूरी है।
राम मंदिर: प्राण प्रतिष्ठा के दो वर्षों में सामने आए चार बड़े विवाद, प्रबंधन पर उठे सवाल
रामलला के भव्य मंदिर में हुए ऐतिहासिक प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के बाद के पिछले दो वर्षों के सफर पर नजर डालें, तो मंदिर प्रबंधन और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े चार बड़े विवाद सामने आ चुके हैं। इन सभी मामलों में ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों, अधिकारियों और वहां की आंतरिक प्रबंधन व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर लगातार गंभीर सवालिया निशान खड़े होते रहे हैं। हालांकि, आश्चर्य की बात यह है कि पिछले किसी भी विवाद में अब तक कोई ठोस या बड़ी दंडात्मक कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई। इस बार का चढ़ावा चोरी का मामला इसलिए अधिक तूल पकड़ चुका है क्योंकि इसका सीधा संबंध आम श्रद्धालुओं की आस्था और उनके द्वारा दिए गए दान से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि सोशल मीडिया से लेकर हर तरफ इसकी तीखी चर्चा हो रही है और दोषियों पर कठोरतम कानूनी कार्रवाई की मांग की जा रही है।
ये हैं वे चार मुख्य विवाद जिन्होंने राम मंदिर की सुरक्षा और प्रबंधन व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया:
1. रामलला का मुकुट चोरी होना: प्राण प्रतिष्ठा के कुछ ही महीनों बाद रामलला के दरबार से एक कीमती मुकुट चोरी होने की खबर आई थी। शुरुआत में ट्रस्ट की तरफ से इस गंभीर मामले को दबाने और छिपाने का पूरा प्रयास किया गया, लेकिन कुछ ही दिनों में यह मामला सार्वजनिक रूप से उजागर हो गया। बाद में यह मुकुट ट्रस्ट के ही एक रसूखदार पदाधिकारी के करीबी व्यक्ति के कब्जे से कारसेवकपुरम इलाके से बरामद किया गया था।
2. जमीनों की खरीद-फरोख्त का विवाद: मुकुट चोरी का विवाद अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि मंदिर के आसपास की जमीनों की खरीद-फरोख्त में भारी वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगा। ट्रस्ट द्वारा खरीदी गई जमीनों की कीमतों और सौदों को लेकर तमाम विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने तीखे सवाल उठाए थे। हालांकि, इस मामले में भी कोई बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई नहीं देखी गई।
3. दर्शन पास घोटाला: पिछले वर्ष मंदिर में वीआईपी और सुगम दर्शन के नाम पर एक बड़ा पास घोटाला उजागर हुआ था। कई असामाजिक तत्वों और दलालों ने मिलकर फर्जी पास रैकेट चलाया और सीधे-साधे श्रद्धालुओं से दर्शन कराने के नाम पर मोटी रकम वसूली। इस जांच में कुछ स्थानीय पुलिसकर्मियों की संलिप्तता भी सामने आई थी, जिसके बाद प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए कई लोगों पर कार्रवाई की। इस व्यवस्था को पूरी तरह फुलप्रूफ बनाने के लिए बाद में क्यूआर (QR) कोड आधारित डिजिटल पास प्रणाली लागू की गई, जिससे फर्जीवाड़े पर काफी हद तक लगाम लगी।
4. चढ़ावा चोरी और वित्तीय हेरफेर: दर्शन पास का मामला थमा ही था कि अब सीधे दानपात्र से चढ़ावा चोरी करने का महाघोटाला सामने आ गया है। इस बार के खेल में न केवल छोटे और मामूली संविदा कर्मचारी संदेही हैं, बल्कि ट्रस्ट के अंदरूनी सूत्र और प्रबंधन से जुड़े बड़े चेहरे भी सीधे तौर पर सवालों के घेरे में आ गए हैं।
पारदर्शिता की कमी और लचर निगरानी तंत्र से बढ़ीं घटनाएं
एक के बाद एक लगातार सामने आ रहे इन विवादों के कारण राम मंदिर ट्रस्ट की आंतरिक कार्यशैली और सुरक्षा ऑडिट पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जानकारों और श्रद्धालुओं का स्पष्ट मानना है कि मंदिर की प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्थाओं में जिस उच्च स्तर की पारदर्शिता (ट्रांसपेरेंसी) होनी चाहिए थी, उसकी भारी कमी है। यदि पूर्व में हुए मुकुट चोरी या भूमि विवाद के मामलों में ही ट्रस्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए दोषियों को जेल भेजा होता और मंदिर परिसर के भीतर एक मजबूत व आधुनिक तकनीकी निगरानी तंत्र (सर्विलांस सिस्टम) विकसित किया होता, तो आज दान की राशि चोरी होने जैसी शर्मनाक घटनाओं को आसानी से रोका जा सकता था। अब सभी की निगाहें 24 जून को हाईकोर्ट द्वारा दिए जाने वाले आदेश पर टिकी हैं।
