बागी सांसदों पर कार्रवाई की घड़ी करीब, ओम बिरला जल्द सुनाएंगे निर्णय

नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिरला जल्द ही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और शिवसेना (यूबीटी) के बागी सांसदों के दल-बदल मामले पर अपना बड़ा फैसला सुना सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक, जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होने वाले संसद के मॉनसून सत्र से पहले इस मामले पर कोई महत्वपूर्ण निर्णय आ सकता है, जिसका देश की राजनीति पर गहरा असर पड़ने की संभावना है। स्पीकर ओम बिरला ने इस मुद्दे पर दोनों मूल पार्टियों और बागी गुटों के नेताओं से मुलाकात कर उनका पक्ष सुन लिया है। लिया जाने वाला फैसला कानूनी रूप से पूरी तरह मजबूत हो, इसके लिए संसद के कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञ दल-बदल विरोधी कानून से जुड़े पुराने मामलों और नियमों का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं।
टीएमसी के 20 सांसदों की बगावत और अयोग्यता की मांग
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने लोकसभा चुनाव में 29 सीटें जीती थीं, जिनमें से एक सांसद के निधन के बाद फिलहाल एक सीट खाली है। पार्टी के 29 में से 20 सांसदों ने बगावत करते हुए पश्चिम बंगाल के हावड़ा की एक रजिस्टर्ड लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) का दामन थाम लिया है। इन बागी सांसदों ने लोकसभा में अलग बैठने की जगह मांगी है और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार (NDA) को अपना समर्थन देने की इच्छा जताई है। इस बगावत के बाद टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर से मुलाकात कर सभी 20 बागी सांसदों को दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित करने के लिए अलग-अलग याचिकाएं सौंपी हैं।
शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसद शिंदे गुट में शामिल
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) को भी ऐसे ही संकट का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के टिकट पर जीते 9 सांसदों में से 6 सांसद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं। इस मामले में उद्धव गुट के नेता अनिल देसाई और अरविंद सावंत ने स्पीकर ओम बिरला से मिलकर संविधान के नियमों के तहत कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने बागी सांसदों द्वारा दिए गए किसी भी लिखित पत्र की कॉपी मांगी, जिस पर स्पीकर ने साफ किया कि बागी सांसदों की तरफ से अभी तक उन्हें लिखित में ऐसा कुछ भी नहीं मिला है।
क्या कहता है दल-बदल विरोधी कानून?
टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) दोनों ही पार्टियों का तर्क है कि बागी सांसदों को अयोग्य ठहराया जाना चाहिए। दोनों दलों के नेताओं का कहना है कि संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत दल-बदल कानून से राहत केवल तभी मिल सकती है, जब पूरी मूल राजनीतिक पार्टी के कम से कम दो-तिहाई हिस्से का किसी दूसरी पार्टी में विलय (मर्जर) हो जाए। केवल सांसदों या विधायकों का एक समूह अलग होकर किसी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो सकता, भले ही उनके पास दो-तिहाई बहुमत क्यों न हो। ऐसे में सांसदों के इस अलग गुट के विलय को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
डीएमके भी कांग्रेस से अलग बैठेगी, बदला समीकरण
इस बीच आगामी मॉनसून सत्र को देखते हुए लोकसभा सचिवालय सांसदों के बैठने की नई व्यवस्था तय करने में जुट गया है। टीएमसी और शिवसेना के बागी सांसदों के अलावा, डीएमके (DMK) ने भी संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की जगह मांगी है। दरअसल, डीएमके ने कांग्रेस के साथ अपना पुराना गठबंधन तोड़ दिया है और अब मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके (TVK) से हाथ मिला लिया है। इस नए राजनीतिक समीकरण के कारण संसद के भीतर बैठने की व्यवस्था और विपक्षी एकजुटता में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
