दिल्ली में स्कूल फीस बढ़ाना अब आसान नहीं, पहले लेनी होगी अभिभावकों की मंजूरी

नई दिल्ली: प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोतरी पर लगाम लगाने के लिए शिक्षा निदेशालय ने एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब निजी स्कूल अपनी मर्जी से फीस तय नहीं कर पाएंगे। नई व्यवस्था के तहत फीस निर्धारण के पूरे तंत्र को बदल दिया गया है, ताकि निर्णय प्रक्रिया में अभिभावकों की भी बराबर की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

फीस बढ़ोतरी के बदले नियम: 31 जुलाई तक देना होगा पूरा हिसाब

अब तक सबसे बड़ी शिकायत यह रहती थी कि स्कूल प्रबंधन बंद कमरों में फीस बढ़ाने का फैसला कर लेता था और अभिभावकों को सिर्फ बढ़ी हुई फीस का फरमान सुना दिया जाता था। अब इस मनमानी को पूरी तरह रोक दिया गया है।

नए नियमों के मुताबिक, सभी निजी स्कूलों को अगले तीन सालों की प्रस्तावित फीस का पूरा ढांचा और पिछले तीन वर्षों के ऑडिटेड वित्तीय दस्तावेज (खर्च और आमदनी का ब्योरा) 31 जुलाई तक 'स्टेट लेवल फीस रेगुलेटरी कमेटी' (SLFRC) के सामने जमा करने होंगे। यह समिति स्कूल की वास्तविक वित्तीय जरूरतों की गहन जांच करेगी और संतुष्ट होने पर ही मंजूरी देगी।

दिल्ली हाई कोर्ट का सख्त आदेश: अतिरिक्त फीस करनी होगी वापस

शिक्षा निदेशालय ने दिल्ली हाई कोर्ट के 28 फरवरी 2026 के फैसले का हवाला देते हुए साफ किया है कि जब तक नई फीस संरचना को 'SLFRC' और जिला फीस अपीलीय समिति से हरी झंडी नहीं मिल जाती, तब तक कोई भी निजी स्कूल पिछले सत्र (2025-26) से एक भी रुपया ज्यादा नहीं वसूल सकता।

अभिभावकों के लिए बड़ी राहत: यदि कोई स्कूल अस्थायी रूप से ज्यादा फीस ले भी लेता है, और बाद में कमेटी कम फीस तय करती है, तो स्कूल को वह अतिरिक्त रकम अभिभावकों को वापस लौटानी होगी या आगे की फीस में एडजस्ट (समायोजित) करनी होगी।

लॉटरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग और पारदर्शिता

कमेटी के सदस्यों के चयन में किसी भी तरह के भाई-भतीजावाद या पक्षपात को रोकने के लिए कड़े सुरक्षा उपाय किए गए हैं। अब चयन के लिए होने वाले ड्रॉ की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी और हर एक कार्यवाही का लिखित रिकॉर्ड तैयार होगा। इतना ही नहीं, चुने गए सदस्यों की सूची को स्कूल की आधिकारिक वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक करना अनिवार्य होगा।

सामाजिक प्रतिनिधित्व और भागीदारी आधारित मॉडल

शिक्षा निदेशालय ने स्पष्ट किया है कि इस पूरी प्रक्रिया में समाज के हर वर्ग का साथ होना जरूरी है। चयन में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग और महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाएगा। यदि मुख्य लॉटरी में ऐसा नहीं हो पाता, तो वेटिंग लिस्ट (प्रतीक्षा सूची) से सदस्यों को शामिल कर इस कानूनी शर्त को पूरा किया जाएगा।

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