नर्मदा अवॉर्ड विवाद का आखिरकार हुआ अंत, जानिए क्या है पूरा मामला

जयपुर। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की गरिमामयी उपस्थिति में चार राज्यों—राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश—के बीच दशकों पुराना नर्मदा अवार्ड भुगतान विवाद आखिरकार पूरी तरह सुलझ गया है। इस ऐतिहासिक 'वन-टाइम सेटलमेंट' समझौते पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सहित चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। यह निर्णय सरदार सरोवर परियोजना की निर्माण लागत से जुड़े वित्तीय मतभेदों को हमेशा के लिए समाप्त कर देगा, जिससे भविष्य में इन राज्यों के बीच आपसी तालमेल और सहभागिता का एक नया अध्याय शुरू होगा।

अंतरराज्यीय सहयोग और जल प्रबंधन को नई गति

केंद्र सरकार के विशेष प्रयासों से हुए इस समझौते से नर्मदा नदी के पानी का चारों राज्यों में अधिक कुशल और समन्वित तरीके से उपयोग संभव हो सकेगा। इस कदम से न केवल जल प्रबंधन की व्यवस्थाएं सुधरेंगी, बल्कि अटकी हुई विकास परियोजनाओं को भी रफ्तार मिलेगी। गौरतलब है कि राजस्थान सरकार जल संकट से निपटने के लिए लगातार पड़ोसी राज्यों से संपर्क में है, जिसके तहत हाल ही में मध्य प्रदेश के साथ पार्वती-कालीसिंध-चंबल (एमपीकेसी) परियोजना और हरियाणा के साथ हथिणीकुंड बैराज से शेखावाटी तक पानी लाने जैसे बड़े फैसले भी किए जा चुके हैं।

दशकों पुराने नर्मदा जल विवाद की पृष्ठभूमि

इस पूरे मामले की जड़ें साल 1979 में गठित नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण के फैसले से जुड़ी हैं, जिसने चारों राज्यों के लिए पानी का कोटा तय किया था। उस न्यायाधिकरण के नियमों के अनुसार, मानसून के सीजन में नदी में बहने वाले अतिरिक्त पानी का इस्तेमाल कोई भी संबंधित राज्य अपने स्तर पर कर सकता है, और इस अतिरिक्त इस्तेमाल को उस राज्य के तय कोटे में नहीं गिना जाएगा। इसी को लेकर लंबे समय से वित्तीय देनदारियों का विवाद चल रहा था, जिसे अब पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।

अतिरिक्त पानी के भंडारण और भविष्य का रोडमैप

समझौते की सफलता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के अपने बजट में मानसून के अतिरिक्त पानी को सहेजने के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने की घोषणा की है। इस योजना के लिए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी बनाई जा रही है, ताकि वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करके इस पानी को इकट्ठा किया जा सके। सरकार का मुख्य उद्देश्य इस पानी को पश्चिमी राजस्थान के उन इलाकों तक पहुंचाना है जो भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं, जिससे वहां पीने के पानी की समस्या का स्थायी समाधान हो सके।

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