भाजपा की पिच पर बोल्ड न हो जाएं अखिलेश यादव? बदली सियासी रणनीति पर उठे सवाल

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इन दिनों एक नए और बदले हुए अवतार में नजर आ रहे हैं। राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मामले पर उनका सधा हुआ रुख और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के प्रति उनकी श्रद्धा ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। सपा कार्यालय में 'सनातन ही समाजवाद है' के पोस्टर लगना उनके इस नए चुनावी एजेंडे को स्पष्ट कर रहा है। हालांकि, पार्टी के भीतर और बाहर उनके इस 'सॉफ्ट हिंदुत्व' के प्रयोग को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है, क्योंकि पार्टी का एक बड़ा आधार अब तक पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की राजनीति से प्रेरित रहा है।

चुनावी रणनीति और अतीत की चुनौतियां

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में भी सपा ने भगवान परशुराम की प्रतिमा स्थापित कर ब्राह्मण समुदाय को लुभाने का प्रयास किया था, लेकिन आंकड़ों के मुताबिक ब्राह्मण वोटों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ ही रहा। अब एक बार फिर चुनावी साल में अपना रुख बदलते हुए अखिलेश यादव को डर है कि कहीं सवर्णों को रिझाने की कोशिश में वे अपने पारंपरिक ओबीसी और दलित वोट बैंक को नाराज न कर बैठें। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिंदुत्व के मूल मुद्दे पर भाजपा के मजबूत और स्पष्ट ब्रांड के सामने अखिलेश यादव का यह नया प्रयोग एक बड़ी राजनीतिक चुनौती हो सकता है।

हिंदुत्व की पिच पर भाजपा का दबदबा

राजनीतिक जानकारों का तर्क है कि जब मतदाताओं के पास भाजपा के रूप में हिंदुत्व का 'असली वर्जन' मौजूद है, तो वे किसी अन्य दल के सॉफ्ट हिंदुत्व को क्यों चुनेंगे। योगी आदित्यनाथ का भगवा चेहरा और गोरक्षपीठ के महंत के रूप में उनकी पहचान उन्हें हिंदुत्व का स्वतः ब्रांड एंबेसडर बनाती है। ऐसी स्थिति में सपा प्रमुख के लिए भाजपा की पिच पर खेलना जोखिम भरा हो सकता है। यह आशंका भी जताई जा रही है कि यदि वे अपने मूल पीडीए नारे से भटकते हैं, तो उनके कोर वोट बैंक का ध्रुवीकरण कमजोर पड़ सकता है, जबकि सवर्ण वोटों का अनुपात उनकी उम्मीदों से कम रह सकता है।

नेतृत्व की कमी और दिल्ली-लखनऊ की दूरी

अखिलेश यादव की वर्तमान राजनीति में एक और बड़ा संकट दिल्ली और लखनऊ के बीच की बढ़ती दूरी है। सांसद के तौर पर दिल्ली में अधिक समय बिताने के कारण राज्य की राजधानी में उनकी सक्रियता पर सवाल उठ रहे हैं। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्होंने माता प्रसाद पांडेय जैसे बुजुर्ग नेता को जिम्मेदारी तो दी है, लेकिन उनके कम मुखर होने से पार्टी में एक रिक्तता महसूस की जा रही है। सवर्णों के बीच भाजपा से जुड़ी कुछ नाराजगी के बावजूद, विपक्षी दल के रूप में अखिलेश यादव उसे वोटों में कितनी तब्दील कर पाएंगे, यह आगामी विधानसभा चुनावों में ही स्पष्ट हो पाएगा।

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