शराब घोटाला केस में बड़ा अपडेट, सुप्रीम कोर्ट ने चैतन्य बघेल के मामले में ED की याचिका खारिज

नई दिल्लीछत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कथित शराब घोटाले से जुड़े कानूनी प्रकरणों में पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता भूपेश बघेल के सुपुत्र चैतन्य बघेल को देश की सर्वोच्च अदालत (सु्रीम कोर्ट) से एक बहुत बड़ी कानूनी राहत हासिल हुई है।

न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राज्य सरकार की उन दोनों महत्वपूर्ण याचिकाओं को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिनके माध्यम से निचली अदालत या हाईकोर्ट द्वारा चैतन्य को दी गई जमानत का कड़ा विरोध किया जा रहा था। इस अदालती फैसले से न केवल चैतन्य बघेल की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर मंडरा रहा खतरा टल गया है, बल्कि जांच और अभियोजन एजेंसियों के उस कार्य-व्यवहार पर भी बेहद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जिसके तहत नियमित जमानत के फैसलों को भी लगभग आदतन उच्च अदालतों में चुनौती दी जाती है।

शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणी: "महज तकनीकी आधार पर किसी की आजादी छीनना सही नहीं"

भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान जमानत रद्द कराने की बढ़ती हुई प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

सुप्रीम कोर्ट ने बेहद स्पष्ट शब्दों में यह टिप्पणी की कि केवल मामूली कानूनी खामियों या तकनीकी आधार पर किसी भी आरोपी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आजादी छीनना कितना उचित है, इस पर न्यायिक रूप से विचार किए जाने की सख्त जरूरत है।

यद्यपि, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस फैसले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा राज्य पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) के विरुद्ध की गई कुछ प्रतिकूल टिप्पणियों को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड से हटा दिया है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और ईओडब्ल्यू के वकीलों ने दावा किया था कि चैतन्य इस पूरे कथित घोटाले के मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक हैं, जबकि इसके विपरीत चैतन्य बघेल के बचाव पक्ष के वकील ने मजबूत दलील देते हुए कहा कि लंबी जांच प्रक्रिया के बाद हाईकोर्ट ने मामले के हर छोटे-बड़े पहलू पर कानूनी रूप से विचार करने के बाद ही पूरी तरह न्यायसंगत फैसला सुनाया था।

'समानता के अधिकार' का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने पहले दी थी जमानत

इससे पहले, बीते दो जनवरी को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की एकल पीठ ने चैतन्य बघेल को प्रवर्तन निदेशालय (ED) और ईओडब्ल्यू (EOW) दोनों ही मामलों में विधिवत जमानत प्रदान की थी।

उच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत आदेश में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था कि इस पूरे प्रकरण के अन्य कथित मुख्य साजिशकर्ता—जैसे अनवर ढेबर, अनिल टुटेजा और अरविंद सिंह—को देश की शीर्ष अदालत से पहले ही नियमित जमानत मिल चुकी है।

ऐसी परिस्थितियों में चैतन्य बघेल को लंबे समय तक हिरासत में रखना भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त 'समानता के अधिकार' (Right to Equality) के स्थापित सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन होगा।

अदालत ने यह भी माना कि इस मामले से जुड़े अधिकांश साक्ष्य दस्तावेज के रूप में पहले ही मौजूद हैं, आरोपी काफी लंबी अवधि से न्यायिक हिरासत में था, तथा प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की धारा 50 के अंतर्गत दर्ज बयानों की वास्तविकता और साक्ष्यों का वास्तविक मूल्यांकन केवल ट्रायल (मुकदमे) के दौरान ही सही तरीके से संभव हो सकता है।

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