विदेशी फंडिंग कानून पर बढ़ा विवाद, FCRA बिल को लेकर आमने-सामने भारत और अमेरिका

नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र में प्रस्तुत विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक 2026 को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी बहस छिड़ गई है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने इस विधेयक पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे ईसाइयों और धार्मिक संस्थानों पर हमला करार दिया है। मूर का दावा है कि इन नए प्रावधानों के जरिए सरकार को चर्चों और धार्मिक निकायों की संपत्तियों का अधिग्रहण करने का अधिकार मिल जाएगा, जिससे भारत-अमेरिका के कूटनीतिक रिश्तों में खटास आ सकती है।

अमेरिकी सांसद राइली मूर का तीखा बयान

अमेरिकी कांग्रेस सदस्य राइली मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर भारत में ईसाइयत के प्राचीन इतिहास का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए। उन्होंने लिखा कि ईसा मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद सेंट थॉमस केरल के मालाबार तट आए थे, जिसके बाद से भारत में ईसाई समुदाय का एक लंबा इतिहास रहा है। मूर ने चेतावनी दी कि यदि यह विधेयक इसी रूप में पारित होता है, तो यह दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन जाएगा।

FCRA संशोधन विधेयक 2026 के प्रमुख और विवादित बिंदु

विदेशी दान प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों पर कड़े नियंत्रण के लिए लाए गए इस विधेयक में कई सख्त प्रस्ताव शामिल हैं:

  • डेजिग्नेटेड अथॉरिटी का गठन: विधेयक का सबसे विवादित प्रावधान एक केंद्रीय प्राधिकारी की नियुक्ति का है। किसी संस्था का पंजीकरण रद्द होने, सरेंडर करने या अवधि समाप्त होने की स्थिति में यह अथॉरिटी विदेशी फंड से बनी संपत्तियों और खातों का प्रबंधन अपने नियंत्रण में ले लेगी।

  • नवीनीकरण के लिए न्यूनतम फंड की शर्त: पिछले दो वित्तीय वर्षों में 10 लाख रुपये से कम विदेशी फंड का उपयोग करने वाली संस्थाओं के पंजीकरण का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा।

  • फंड ट्रांसफर पर पूरी रोक: विदेशी चंदे को किसी अन्य संगठन में ट्रांसफर करने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। साथ ही प्रोजेक्ट्स, वेबसाइट्स और सोशल मीडिया हैंडल की विस्तृत जानकारी देना अनिवार्य होगा।

पारदर्शिता बनाम सरकारी नियंत्रण: दो पक्ष

भारत सरकार का रुख स्पष्ट है कि विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों, अवैध धर्म परिवर्तन या विकास कार्यों को रोकने के लिए नहीं होना चाहिए। समर्थकों का तर्क है कि इससे मनी लॉन्ड्रिंग पर रोक लगेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी। दूसरी ओर, आलोचकों और विदेशी संस्थाओं का मानना है कि अत्यधिक सरकारी नियंत्रण से स्वतंत्र सामाजिक, शैक्षणिक व धार्मिक कार्यों में बाधा आएगी और एनजीओ की स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी नियमों के उल्लंघन पर एमनेस्टी इंटरनेशनल और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) जैसी कई संस्थाओं के FCRA लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं। गृह मंत्रालय का स्पष्ट कहना है कि देश में नियमों का पालन सभी के लिए अनिवार्य है।

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