चुनाव से पहले सियासी बिसात बिछी, राम मंदिर-वंदे मातरम से तय होगा नैरेटिव?

नई दिल्ली। जनता के नजरिए से संसद का मानसून सत्र भले ही हंगामे की भेंट चढ़ गया हो, लेकिन राजनीतिक दल यहाँ से खाली हाथ नहीं लौटे हैं। आगामी राज्य विधानसभा चुनावों को देखते हुए विपक्ष शुरुआत में बेहद उत्साहित था। उसे लगा कि जिन मुद्दों पर उसने संसद में सरकार को घेरा है, उन्हीं के दम पर वह चुनावी मैदान में भी बढ़त बना लेगा।हालांकि, शुरुआत में रक्षात्मक दिख रहा सत्ता पक्ष अब पूरी तरह आक्रामक अंदाज में पलटवार कर रहा है। नेताओं के तेवर और सोशल मीडिया पर भाजपा की अचानक बढ़ी सक्रियता साफ इशारा कर रही है कि अब बैकफुट पर जाने की बारी विपक्ष की है।
मुद्दों की राजनीति और नैरेटिव का खेल
राज्यों के चुनावी मुद्दे भले ही अलग हों, लेकिन माहौल बनाने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए दोनों पक्ष अपने-अपने नैरेटिव को धार दे रहे हैं। जंतर-मंतर के प्रदर्शन के जवाब में रांची का मुद्दा हो, राष्ट्रवाद के नाम पर ‘वंदे मातरम’ की चर्चा हो या फिर सुरक्षा के मोर्चे पर ‘दिमागी नक्सली’ जैसा बयान—इन सभी के जरिए सियासी फिजां को गरमाने की कोशिश जारी है।
संसद सत्र की शुरुआत में विपक्ष आक्रामक रूप में था। कांग्रेस ने छात्र आंदोलनों को प्रमुखता से उठाया, तो समाजवादी पार्टी ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी के आरोपों को लेकर सरकार पर तीखे हमले किए। आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने भी उनका खुलकर साथ दिया। गृह मंत्री से जवाब की मांग करते हुए विपक्ष जनता को यह संदेश देने में जुटा था कि सरकार चर्चा से भाग रही है।
भाजपा को कैसे मिला बाजी पलटने का अवसर?
सत्र के अंतिम दिनों में बाजी अचानक पलट गई। गृह मंत्री अमित शाह ने जब स्वयं सामने आकर छात्रों के मुद्दे पर हर बिंदु का जवाब देने का प्रस्ताव रखा, तब विपक्ष चर्चा के लिए तैयार नहीं हुआ। इसी मोड़ का फायदा उठाते हुए भाजपा ने पासा पलट दिया और जनता के बीच यह संदेश पहुंचा दिया कि वास्तव में विपक्ष खुद ही बहस से पीछे हट रहा है।
इसी बीच, कांग्रेस अध्यक्ष की जनसभा के बाद मंच के 'शुद्धिकरण' के विवाद ने सरकार को कुछ समय के लिए असहज जरूर किया, लेकिन इसके बाद घटे घटनाक्रमों ने विपक्ष को ही कठघरे में खड़ा कर दिया।
राहुल गांधी और कांग्रेस सीधे निशाने पर
कांग्रेस के एक मंच से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री और देश की विदेश नीति पर की गई टिप्पणियों तथा पार्टी नेता संदीप दीक्षित के बयान ने भाजपा को बड़ा मुद्दा दे दिया। इसके चलते राहुल गांधी सीधे सरकार के निशाने पर आ गए।
इसके बाद, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय में 'वंदे मातरम' के गान को रोकने से जुड़ा वीडियो सामने आने के बाद भाजपा को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर सीना तानकर खड़े होने का मौका मिल गया। नतीजतन, जो विपक्ष शुरुआत में हावी दिख रहा था, वह अब रक्षात्मक मुद्रा में आ गया है।
आगामी चुनावों पर असर
'दिमागी नक्सली' वाले बयान को लेकर भी विपक्षी नेता अब अपने-अपने तरीके से सफाई और काट ढूंढने में लगे हैं। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां दर्शाती हैं कि इन सभी मुद्दों को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे चुनावी राज्यों में भुनाने की पूरी कोशिश होगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि किस दल का रणनीतिक और संगठनात्मक कौशल इस नैरेटिव की लड़ाई में उसे आगे ले जाता है।
