हिलजात्रा में गूंजे लोकगीत और जयकारे, लखिया भूत के दर्शन को उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

पिथौरागढ़: उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ की सोर घाटी में ऐतिहासिक लोक संस्कृति, अगाध आस्था और पराक्रम का प्रतीक माना जाने वाला 'हिलजात्रा' महोत्सव पूर्ण पारंपरिक उल्लास और भक्ति के वातावरण में संपन्न हुआ। कुमौड़ स्थित मैदान में आयोजित इस भव्य उत्सव का साक्षी बनने के लिए हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। इस अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वर्चुअल माध्यम से उपस्थित होकर क्षेत्रवासियों को बधाई दी और पिथौरागढ़ के ग्राम जाखनी स्थित बाबा गंगनाथ मंदिर के सौंदर्यीकरण कराने का ऐलान किया।

500 वर्षों से अधिक पुरानी सांस्कृतिक विरासत

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में कहा कि विगत पांच शताब्दियों से निरंतर मनाया जा रहा हिलजात्रा पर्व देवभूमि की अनूठी लोक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। सातू-आठू पर्व के दौरान शुरू होने वाली यह परंपरा मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन, पहाड़ी जीवन के संघर्ष और ग्रामीण परिवेश की जीवंतता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक धार्मिक या पारंपरिक समारोह नहीं है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने और पूर्वजों के शौर्य एवं आदर्शों का स्मरण कराने का माध्यम भी है।

लखिया भूत का अलौकिक आगमन और आकर्षण

महोत्सव का सबसे रोमांचक और मुख्य केंद्र बिंदु भगवान शिव के गण और ग्राम देवता के रूप में पूजे जाने वाले 'लखिया भूत' का मैदान में अवतरण रहा। काले परिधानों, गले में रुद्राक्ष, कमर में बंधी रस्सी और हाथ में काला चंवर धारण किए लखिया भूत को पारंपरिक रूप से मंदिर से जंजीरों में बांधकर मैदान तक लाया गया। मान्यता है कि लखिया भूत का आगमन समूचे क्षेत्र में सुख, शांति, समृद्धि और अच्छी पैदावार का आशीर्वाद लेकर आता है। इसके अलावा आयोजन में ढोल, नगाड़ों, हुड़के और मंजीरों की गूंज के बीच गलिया बैल, छोटी हौल, नेपाली हौल, हिरन और चीतल जैसे पारंपरिक पात्रों की प्रस्तुतियों ने भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

नेपाल से जुड़े काष्ठ मुखौटों का ऐतिहासिक सच

हिलजात्रा में प्रयुक्त होने वाले लकड़ी के मुखौटों का संबंध सोर घाटी की वीरता और ऐतिहासिक गाथाओं से जुड़ा है। प्रचलित लोककथा के अनुसार, कुमौड़ क्षेत्र के चार महर भाई नेपाल के प्रसिद्ध इंद्रजात्रा उत्सव में शामिल होने गए थे। वहां उनकी अद्भुत वीरता से प्रसन्न होकर नेपाल नरेश ने उन्हें ये ऐतिहासिक मुखौटे उपहार स्वरूप भेंट किए थे, जिसके बाद पिथौरागढ़ में इस परंपरा की शुरुआत हुई। कृषि-किसानी से जुड़ा यह पर्व पूर्व काल में 'हलजात्रा' के नाम से जाना जाता था, जो कालक्रम में विकसित होकर सोर घाटी की अनूठी पहचान बन गया।

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