नेपाल के सैलाब का असर यूपी तक, मलबे से बनी झीलें बढ़ा सकती हैं बाढ़ का खतरा

लखनऊ: नेपाल में आई अचानक विनाशकारी बाढ़ ने उत्तर प्रदेश के हिमालयी नदियों से सटे इलाकों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। खतरा केवल नेपाल से आने वाली गंडक नदी तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड से निकलने वाली भागीरथी, अलकनंदा और काली-शारदा जैसी नदी प्रणालियों में भूस्खलन, चट्टान खिसकने या मलबे से नदी का प्रवाह रुकने की घटनाएं भी अचानक बाढ़ का कारण बन सकती हैं। लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज के निदेशक व वरिष्ठ भूगर्भ वैज्ञानिक प्रो. महेश जी ठक्कर के अनुसार, हिमालयी आपदाओं को अब सिर्फ भारी बारिश या बादल फटने के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं है।
घाटियों और मैदानी इलाकों तक मलबा पहुंचने का खतरा
नेपाल की घटना में बर्फ और मलबे से नदी के प्रवाह में अस्थायी रुकावट बनने और फिर उसके अचानक टूटने से जलप्रवाह बढ़ने के संकेत मिले हैं। यह स्थिति एक प्राकृतिक बांध जैसा रूप ले लेती है, जिसके टूटने पर पानी के साथ भारी बोल्डर और मलबा तेज रफ्तार से निचले इलाकों में पहुंच जाता है। उत्तराखंड के धराली हादसे जैसी घटनाएं साबित करती हैं कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ढलान और ग्लेशियर की हलचल अचानक तबाही ला सकती है।
उत्तर प्रदेश के निचले इलाकों पर असर की आशंका
नेपाल की त्रिशूली नदी आगे जाकर नारायणी और फिर गंडक नदी प्रणाली से मिलती है, जिससे वहां अचानक बढ़ा जल स्तर और मलबा यूपी के मैदानी क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह भागीरथी और अलकनंदा गंगा प्रणाली का, जबकि काली नदी शारदा नदी तंत्र का हिस्सा हैं। इन भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए उत्तर प्रदेश को केवल स्थानीय बारिश पर ही नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली हर हलचल पर लगातार नजर रखनी होगी।
