अल नीनो ने बढ़ाई चिंता, इस साल आखिरी महीने में और बढ़ सकता है प्रभाव

नई दिल्ली। इस साल दुनिया के कई हिस्सों में मौसम अपना रौद्र रूप दिखा रहा है। भीषण गर्मी, हीटवेव, मूसलाधार बारिश, बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। अब मौसम विशेषज्ञों के बीच प्रशांत महासागर में मजबूत हो रहे अल नीनो को लेकर चिंता है। आशंका जताई जा रही है कि साल के आखिरी महीनों में इसका प्रभाव और तेज हो सकता है और फरवरी 2027 तक मौसम के असामान्य हालात बने रह सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक अल नीनो उस स्थिति को कहा जाता है, जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका प्रभाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के तापमान, बारिश और मौसमी गतिविधियों पर पड़ता है। इस बार समुद्र के तापमान में हो रही बढ़ोतरी ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। अल नीनो 3.4 सूचकांक से जुड़े आंकड़ों में जुलाई में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से करीब दो डिग्री सेल्सियस ज्यादा बताया। बाद की साप्ताहिक रीडिंग में यह अंतर बढ़कर करीब 2.2 से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।
रिपोर्ट के मुताबिक समुद्र की गहराई में भी असामान्य गर्मी दर्ज की गई है। जुलाई और अगस्त में प्रशांत महासागर के कुछ गहरे हिस्सों में पानी का तापमान सामान्य से आठ डिग्री सेल्सियस से ज्यादा रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्र के अंदर जमा यह अतिरिक्त गर्मी अल नीनो को और मजबूत कर सकती है। इसी वजह से इसके संभावित प्रभाव को बेहद गंभीर माना जा रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ओर से जारी आकलनों के मुताबिक अल नीनो की स्थिति के फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना है। इसके 2026 के अंत तक मजबूत होने की आशंका जताई गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी बढ़ते वैश्विक तापमान और चरम मौसम की घटनाओं को लेकर चिंता जता चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र के बढ़ते तापमान के साथ दुनिया के कई हिस्सों में गर्मी और अन्य चरम मौसमी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। भारत के लिए अल नीनो विशेष चिंता का विषय है। मजबूत अल नीनो का असर भारतीय मानसून पर पड़ सकता है, जिससे बारिश कमजोर या अनियमित होने का खतरा रहता है। इसका सीधा असर कृषि, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। हालांकि, अल नीनो का हर बार भारत के मानसून पर एक जैसा प्रभाव नहीं पड़ता और अन्य मौसमी कारक भी अहम भूमिका निभाते हैं। सर्दियों को लेकर भी तस्वीर साफ नहीं है। अल नीनो वैश्विक तापमान और मौसमी पैटर्न को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि भारत में इस बार सर्दी आएगी ही नहीं। विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले महीनों में समुद्री तापमान, मानसूनी परिस्थितियों और अन्य वायुमंडलीय संकेतकों पर नजर रखना जरूरी होगा।
