सीट बंटवारे को लेकर सपा-कांग्रेस में खींचतान, इन 111 सीटों पर सपा ने बनाई अकेले लड़ने की रणनीति

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस जहां जल्द से जल्द सीटों का आवंटन तय करना चाहती है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) जमीनी स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए अधिक समय ले रही है। सपा का पूरा ध्यान प्रत्याशी की जीत की संभावना पर है, जबकि कांग्रेस हाल के प्रदर्शन का हवाला देकर ज्यादा हिस्सेदारी की मांग कर रही है। इसी खींचतान के कारण अब तक सीट बंटवारे का कोई सर्वमान्य फॉर्मूला नहीं बन सका है।
दोनों दलों ने चुनाव पूर्व आंतरिक सर्वे कराए हैं। सपा के सर्वे के अनुसार, पार्टी को 2022 के मुकाबले अधिक सीटें मिलती दिख रही हैं, हालांकि स्पष्ट बहुमत से थोड़ी दूरी बनी हुई है। दूसरी ओर, कांग्रेस अपने सर्वे के आधार पर 100 से अधिक सीटों पर जीत का दावा कर रही है। कांग्रेस राज्य के प्रत्येक जिले से कम से कम एक सीट पर चुनाव लड़ना चाहती है ताकि उसकी राजनीतिक उपस्थिति बनी रहे। पार्टी अब राज्य में छोटी भूमिका के बजाय अधिक महत्व चाहती है, जिसे स्वीकार करना सपा के लिए आसान नहीं है। हालांकि, दोनों दल यह मानते हैं कि यदि सपा के मजबूत जनाधार में कांग्रेस के अतिरिक्त मतदाता जुड़ जाएं, तो चुनाव परिणाम पक्ष में आ सकते हैं।
सपा का रुख: जीती हुई सीटों पर कोई समझौता नहीं
सपा ने कांग्रेस को संकेत दिए हैं कि संभावित उम्मीदवारों और सीटों की संख्या जल्द स्पष्ट की जाए, जिससे जातीय समीकरणों को संतुलित किया जा सके। सपा 2022 में जीती हुई अपनी 111 सीटों पर स्वयं चुनाव लड़ेगी और अधिकतर मौजूदा विधायकों को फिर से मैदान में उतारने की तैयारी में है। जो विधायक पार्टी छोड़कर गए हैं, उनकी सीटों पर कांग्रेस के सहयोग से विशेष घेराबंदी की जाएगी।
भाजपा की जीती सीटों पर मिलेगी कांग्रेस को दावेदारी
लखनऊ: सपा मुख्य रूप से उन सीटों को कांग्रेस के लिए छोड़ने के पक्ष में है जिन पर वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का कब्जा है। शुरुआत में सपा कांग्रेस को 60 से कम सीटें देने का विचार कर रही थी, लेकिन बदलते राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए यह संख्या 75 से 80 सीटों तक हो सकती है।
पीडीए रणनीति को दोहराने की चुनौती
गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को दोबारा दोहराने की है। वर्तमान में राजनीतिक मुद्दे और माहौल बदल चुके हैं। इसके अलावा, नई पीढ़ी (जेन-ज़ी) के मतदाताओं को साधने की अलग चुनौती है, जो पारंपरिक सामाजिक समीकरणों से अलग सोच रखते हैं।
युवाओं और महिला मतदाताओं पर विशेष ध्यान
नए दौर के मतदाताओं को जोड़ने के लिए राहुल गांधी युवाओं के बीच पैठ बनाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं अखिलेश यादव ने महिलाओं और युवा वर्ग का समर्थन हासिल करने के लिए अपनी सांगठनिक रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।
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